अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से अलगाववादी खेमा घाटी में बिल्कुल अलग-थलग पड़ गया है। अब न तो हड़ताल और बंद की कॉल दी जा रही है, न ही पत्थरबाजी की घटनाएं पहले जैसी हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन पद से सैयद अली शाह गिलानी ने इस्तीफा दे दिया है। हुर्रियत (एम) प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक ने भी गतिविधियां सीमित कर दी हैं।
सार्वजनिक रूप से बयानबाजी नहीं हो रही है। शहीदी दिवस पर 13 जुलाई को होने वाले कार्यक्रम को भी हुर्रियत कांफ्रेंस ने रद्द कर दिया है। हालांकि, उसने इसके लिए कोरोना संक्रमण को कारण बताया है, लेकिन माना जा रहा है कि केंद्र की सख्ती और अलगाववादियों के प्रति युवाओं की उदासीनता को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। अब अलगाववादी अपने चेहरे बचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद पिछले एक साल में कश्मीर में काफी कुछ बदला है। अब अलगाववादियों का कोई नाम लेने वाला नहीं रह गया है। हालांकि, उनकी कोशिशें देश विरोधी गतिविधियों को भड़काने की हमेशा से रहती है। अलगाववादियों के दोहरे चरित्र को कश्मीर के युवा अच्छी तरह से समझ गए हैं।
उन्हें पता चल गया है कि उन्होंने अपने परिवार वालों के सुरक्षित भविष्य के लिए उन्हें विदेश भेज रखा है और घाटी के भोले-भाले युवाओं के हाथ में बंदूक और पत्थर थमा रहे हैं। अब युवाओं को अपने करियर और विकास की चिंता है। इसलिए उन्होंने अलगाववादी गतिविधियों व पत्थरबाजी से दूरी बना ली है।
घाटी में शांति व्यवस्था से खिलवाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी। वह चाहे आतंकी हों, अलगाववादी या फिर आम नागरिक। ऐसे सभी अवांछनीय तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - दिलबाग सिंह, डीजीपी