जबकि कस्बे में उनके 30 एकड़ जमीन में सेब के बागान थे, चार मंजिला मकान था, किराएदार थे। लेकिन आंतकवादियों ने सब बर्बाद कर दिया। बताया कि जब आंतकवादियों ने हमला किया तो घर का दरवाजा नहीं खुला। छह महीने के बेटे अमित और उसकी मां को जमीन के नीचे तहखाने में छुपाया।
उस रात रिश्तेदार कन्हैयालाल को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। सेक्टर तीन में बंसीलाल और कृष्णा कौल अपने पूरे परिवार के साथ रैनाबारी में रहते थे। 1990 में चरमपंथियों ने ऐसा तनाव पैदा किया कि पड़ोसी भी उनके दुश्मन हो गए।
बड़े भाई मोतीलाल कौल को छह गोली मारकर हत्या करने का प्रयास किया। लेकिन वे बच गए। धमकी दी गई कि पूरा परिवार कश्मीर छोड़ दे। दस दिनों के भीतर ही परिवार को कश्मीर घाटी छोड़नी पड़ी। घर-बार, सामान सब पीछे छूट गया।
दो कपड़ों में बिना चप्पल पहने ही कौल परिवार ने रात के घने अंधेरे में घर छोड़ दिया। जैसे-तैसे जम्मू पहुंचे, जहां से एक फौजी की मदद से शहर आ गए। इसके बाद कभी कश्मीर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। कृष्णा ने बताया कि कपड़े खरीदने के लिए उसने अखबार बेचा। उन्हें बेचकर तीसरा कपड़ा खरीदा।
उन्होंने बताया कि जब बच्चियों की इज्जत लूटने की बात सुनी, तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। वहीं एक कश्मीरी पंडित ने बताया कि आज भी वह पल याद है कि किस तरह उन्हें अपने ही घर से निकाल दिया गया था। आंखों के सामने ही लोगों को जिंदा जला दिया गया था।