पीडीपी-भाजपा सरकार के गठन की शुरुआत ही विवादों से हुई है। सरकार बनने के बाद पहले ही दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की ओर से रियासत में सकुशल विधानसभा चुनाव संपन्न होने के लिए पाकिस्तान का धन्यवाद ज्ञापन किए जाने पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की ओर से रिहा किए जाने के बाद भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया जताई। इसके बाद दोबारा से मसर्रत को जेल की सलाखों के पीछे भेजा गया जो अब तक जेल में ही है। मतभेद तो इतने गहरे रहे हैं कि एक बार महबूबा को कैबिनेट की बैठक ही छोड़कर चली गईं थीं। बाद में तत्कालीन उप मुख्यमंत्री डॉ. निर्मल सिंह व भाजपा के अन्य मंत्रियों ने मान मनौव्वल की।
40 महीने की सरकार में कई ऐसे मौके आए जब पीडीपी के फैसलों को लेकर भाजपा की कड़ी आलोचना हुई। आम लोगों में यह धारणा बनने लगी थी कि सत्ता की खातिर भाजपा ने पीडीपी के आगे घुटने टेक दिए हैं। आतंकियों की पुनर्वास नीति का भी भाजपा ने जबर्दस्त विरोध किया और यह एजेंडा कैबिनेट की बैठक में पास नहीं हो पाया। इस नीति के तहत पांच लाख रुपये दिए जाने का प्रावधान किया गया था।
पत्थरबाजों की रिहाई को लेकर भी विरोध रहा। इसके बाद भाजपा ने अमरनाथ भूमि आंदोलन के दौरान जिन लोगों पर मुकदमे थे उन्हें हटाने के लिए दबाव बनाया। लेकिन यह दबाव काम न आया। अनुच्छेद 370 व 35ए पर भी समय-समय पर विरोध सामने आता रहा। हाल ही में गुज्जरों की जमीन से अतिक्रमण हटाने के संबंध में जारी मिनट्स को लेकर भी खूब विरोध हुआ। इसमें यह प्रावधान किया गया था कि अतिक्रमण हटाने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी। जम्मू की औद्योगिक जमीन के हस्तांतरण नहीं कर पाने के मामले में कैबिनेट के फैसले पर भी आपत्ति जताई गई थी। कुल मिलाकर गठबंधन सरकार के कार्यकाल में कई बार अंतरविरोध खुलकर सामने आए।