सांबा। लोहड़ी का त्योहार मनाने को लेकर समय के साथ बदलाव आया है। पहले किसी पर्व की रौनक सप्ताह तक बनी रहती थी। पांच-छह दिन पहले से ही छोटे-छोटे बच्चे गलियों में लोहड़ी मांगने निकलते थे। अब पर्व गली-चाैराहों से चाैखट तक सिमट कर रह गया है।
गांव में एक सप्ताह पहले ही हर चौक-चौराहे पर लकड़ी एकत्रित की जाति थी, जिहें लोहडी पर जलाया जाता था। वर्तमान में ज्यादातर घरों में ही लोहड़ी पर अग्नि को अर्घ्य दिया जाता है। घगवाल के दुकानदार रामपाल शर्मा ने कहा कि कस्बे में एक सप्ताह तक पर्व का जश्न रहता था। बच्चे लोहड़ी मांगने के लिए निकलते थे। कमल भट्टी ने कहा कि अब पहले जैसा कुछ नहीं दिखता है। राजपुरा निवासी आशा देवी ने कहा कि मुंगफली, रेवड़ी गांव-मोहल्ले में बांटने की परंपरा लोग भूलते जा रहे हैं।