पूर्व मुख्यमंत्री और नेकां अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने भी महबूबा मुफ्ती की तर्ज पर स्थानीय आतंकियों से बातचीत की वकालत की है। कहा कि वे अपने बच्चे हैं। यह जानना चाहिए कि आखिर उन्हें दुख क्या है। क्यों उन्होंने बंदूक उठाई। पाकिस्तानी आतंकियों से कोई लेना देना नहीं है। तालिबान से बातचीत की वकालत हो सकती है तो फिर हुर्रियत से क्यों नहीं।
अलगाववादियों से भी बातचीत की पहल होनी चाहिए। कुछ निहित स्वार्थी तत्व नहीं चाहते कि घाटी में अमन-चैन आए। ऐसे तत्व ही बातचीत में रोड़ा अटकाते हैं। यह जरूरी नहीं है कि उनकी बातों पर अमल हो ही, पर बात तो सुननी चाहिए ताकि उन्हें यह लग सके कि उनकी बात सुनने वाला भी कोई है।
अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थी तत्वों की वजह से ही घाटी में अमन-चैन बहाल होने में दिक्कत आ रही हैं। यह निहित स्वार्थी तत्व केंद्र सरकार, पाकिस्तान तथा खुद जनता है। ऐसे तत्वों को पहचान कर उनको समाप्त करना होगा। उन्होंने कहा कि रियासत के हालात अच्छे नहीं हैं। आतंकवाद अंदर से रियासत को खा रहा है। इससे मुकाबला करना है तो लोगों का दिल जीतना होगा। बातचीत के लिए माहौल तैयार करना होगा।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से भी अपील है कि वह अपने यहां आतंकवाद को खत्म करें। साथ ही आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद करें। उन्होंने कहा कि शांति के लिए जरूरी है कि भारत व पाकिस्तान के बीच दोस्ती कायम हो। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी जी भी कहा करते थे कि दोस्त बदले जा सकते हैं पर पड़ोसी नहीं। इसलिए पड़ोसियों के बीच दोस्ताना संबंध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय स्वायत्तता कोई नया नहीं है। इससे जम्मू, कश्मीर व लद्दाख तीनों क्षेत्रों का विकास होगा। यदि नेकां की राज्य में सरकार बनी तो 30 दिन के अंदर स्वायत्तता का प्रस्ताव पारित होगा।