प्वाइंट 4875 कॉम्प्लेक्स के अत्यंत महत्वपूर्ण ‘फ्लैट टॉप’ एरिया पर दो तरफा ऑपरेशन की शुरुआत 3 जुलाई को रात 9 बजे हो चुकी थी। अल्फा कंपनी के कंपनी कमांडर मेजर एस वी भास्कर के नेतृत्व में दक्षिण दिशा से और चार्ली कंपनी द्वारा मेजर गुरप्रीत सिंह की अगुवाई में फिंगर एरिया की तरफ से आक्रमण करने की योजना पर अमल शुरू हो गया था।
5 जुलाई तक सभी पोस्ट 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स ने बहादुरी से लड़ते हुए जीत ली थीं। इनमें प्रमुख थीं पिंपल, व्हेल बैक और शिवलिंग। इसी अभियान के साथ थे राइफलमैन संजय कुमार जिन्होंने अद्भुत साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए लेज एरिया की आगे की चौकियों पर अकेले ही अपने दम पर विजय पाई।
संजय कुमार ग्रेनेड फेंकते हुए अकेले ही रेंगते हुए मोर्चे तक पहुंच गए और मोर्चे के अंदर कूद गए। इससे दुश्मन हल्का बक्का रह गया। इस दौरान उन्हीं की मशीनगन छीनकर तीन पाकिस्तानियों को मार डाला। संजय कुमार को इसके लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया और उन्हीं के कंपनी कमांडर मेजर एस वी भास्कर को वीर चक्र प्रदान किया गया। इनके अलावा मेजर गुरप्रीत सिंह और लांस नायक सरवन सिंह को सेना मेडल मिला।
सबसे दुर्गम रास्ते के बीचों बीच कंपनी कमांडर विकास वोहरा की अगुवाई में लेज एरिया की तरफ 30 जवानों का दल आगे बढ़ रहा था। इस बीच कैप्टन नागप्पा के दल का भारी नुकसान हो गया था। कैप्टन विक्रम बत्रा का दल उसके ठीक नीचे कुछ दूरी पर था, जिन्होंने कैप्टन नवीन नागप्पा को घायल अवस्था में उठाकर नीचे पहुंचाया और दस्ते का नेतृत्व संभाल लिया।
कैप्टन बत्रा का दल आगे वाले दुश्मन से घिरे हुए दस्ते को बचाने के लिए आगे बढ़ा और एक-एक कर मोर्चे तबाह करते चला गया। बुरी तरह घायल होने के बाद भी उन्होंने दुश्मन के तीन भारी मशीनगन वाले लेज के सभी बाकी मोर्चो पर विजय पाई और अकेले सात सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। लेकिन बाद में दूर से आती हुई दुश्मन की गोलियों की बौछार से शहीद हो गए।
इसी अभियान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला और उनके साथी कैप्टन नागप्पा को सेना मेडल। तब तक कंपनी कमांडर विकास बोहका बाकी सैनिकों के साथ वहां पहुंच कर मोर्चा संभाल कर दुश्मन के शेष सैनिकों का भी सफाया कर दिया और खुद 4875 पर तिरंगा फहराया। युद्ध के अंत में यूनिट के तत्कालीन सीओ, लेफ्टिनेंट कर्नल वाई के जोशी और मेजर विकास वोहरा को वीर चक्र से नवाजा गया।