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अभी भी पुराने ढर्रे पर आग बुझाने के इंतजाम

Mon, 10 Nov 2014 01:44 PM IST
अमित वर्मा/अमर उजाला, जम्मू
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शहर के कई पुराने भवनों में चल रहे अस्पतालों में आग बुझाने के इंतजाम पुराने ढर्रे पर ही हैं। अस्पताल के प्रमुख यूनिटों में अग्निरोधक यंत्रों का ही सहारा है। इन भवनों में अंडर ग्राउंड पाइप सिस्टम न होने से अगर आग फैलती है, तो मरीजों के पास भागने या दमकल गाड़ी का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
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शहर के प्रमुख जच्चा-बच्चा अस्पताल एसएमजीएस का महाराजा हरि सिंह ने महाराजा गुलाब सिंह के नाम पर 6 मई 1940 को नींव पत्थर रखा गया था, जिसे सन 1943 में लोगों को समर्पित किया गया। उस समय अस्पताल में 172 बेड की क्षमता के साथ इसकी शुरुआत हुई थी। आज यह संख्या 800 से ज्यादा है।

सन 1972 में मेडिकल कालेज खुलने से पहले एसएमजीएस अस्पताल स्वास्थ्य विभाग के अधीन रहा, लेकिन बाद में कालेज का निर्माण होने पर इसे जीएमसी के एसोसिएटेड अस्पतालों में शामिल किया गया। मरीजों का लोड बढ़ने के साथ अस्पताल में बेडों की क्षमता भी बढ़ती रही।
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अस्पताल में पीडियाट्रिक्स, स्किन, ईएनटी और गायनोकालोजी के यूनिट स्थापित हैं, जो संभाग के सबसे बड़े इसी अस्पताल में हैं। अस्पताल में गैस प्लांट, पावर स्टेशन, ड्रग स्टोर, जनरल स्टोर, मेडिकल रिकार्ड सेक्शन सहित अन्य कई प्रमुख यूनिट भी स्थापित हैं, लेकिन पुराने भवन में अंडर ग्राउंड पाइप सिस्टम नहीं है।

अस्पताल के पुराने और नए पेडियाट्र्कि ब्लाक के वार्डों और अन्य प्रमुख यूनिटों में आग बुझाने के लिए अग्निरोधक यंत्र स्थापित किए गए हैं, लेकिन पुराने ब्लाक में आग फैलने की सूरत में तत्काल कुछ न करने पर भारी तबाही हो सकती है।

इसी तरह जम्मू पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र को कवर कर रहे सरवाल अस्पताल के पुराने ब्लाक में भी अंडर ग्राउंड पाइप सिस्टम नहीं है। यहां भी अग्निरोधक यंत्रों का सहारा लिया जा रहा है। गांधीनगर अस्पताल के पुराने ब्लाक में भी यही व्यवस्था है। जीएमसी में फायर सिस्टम को विकसित किया गया है, लेकिन पुराने ब्लाक में काफी कुछ करना बाकी है।
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कब-कब झुलसे अस्पताल
-25 मई 2011 को सरवाल अस्पताल का माइनर आपरेशन थियेटर जलकर राख।
- जुलाई 2010 में जीएमसी के ब्लड बैंक के बाहर बिजली का कंट्रोल रूम जला। घंटों तक ब्लड बैंक में काम ठप।
-9 जून 2011 जीएमसी के मेटरन रूम में एसी की तार में शाट सर्किट से धुआं फैलने से मची अफरा-तफरी।
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