आतंकवाद प्रभावित कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के सबसे बड़े पर्व महाशिवरात्रि पर आज मुस्लिम समुदाय के लोग सलाम की रस्म निभाएंगे। आपसी भाईचारे की मिसाल इस रस्म के तहत शिवरात्रि मना रहे कश्मीरी पंडितों को मुस्लिम परिवार सदस्य घर जाकर मुबारकबाद देते हैं। तीन दशक से अधिक समय से विस्थापन का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडित महाशिवरात्रि पर सभी परंपराएं निभा रहे हैं।
इस बीच आतंकवाद के दौर में भी घाटी न छोड़ने वाले पंडित बेखौफ पर्व मना रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम समुदाय के लोगों की इस पर्व में शिरकत कश्मीरियत के असल किरदार का पैगाम भी देती है। पंडितों का कहना है कि अब भी यह परंपरा जारी है और यही कश्मीरियत और इंसानियत की खूबसूरती है।
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि शिवरात्रि पर वे भगवान भैरव की भी पूजा करते हैं। भगवान भैरव को मांस और मछली का भोग लगाने की परंपरा है, जिसे वह निभा रहे हैं। मछली के लिए प्रदेश सरकार की ओर से विशेष इंतजाम किए गए थे। रीति के अनुसार शाकाहारी भोग भी लगाए जाते हैं। इसमें पांच-छह प्रकार की सब्जियां होती हैं। रात में पूजा अर्चना करने के बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
आतंकवाद प्रभावित रहे अनंतनाग जिले के पहलगाम इलाके के होगाम निवासी महाराजा किशन पंडिता का कहना है कि शिवरात्रि पर शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा है। रीति के अनुसार लोग भोग चढ़ाते हैं। शाकाहारी लोग नंदड़ू (कमल फूल की टहनी), कड़म, दमआलू, पनीर समेत अन्य प्रकार की सब्जियों का भोग लगाते हैं। मांसाहारी रीति में बकरे का मांस और मछली का भोग लगाने की परंपरा है।
कश्मीरी पंडित और रिकन्सीलिएशन, रिटर्न एंड रिहैबिलिटेशन ऑफ माइग्रेंट्स के चेयरमैन सतीश महलदार का कहना है कि पंडित समुदाय शिवरात्रि को भगवान शिव व पार्वती की शादी के रूप में नहीं देखता है। बल्कि इसे शिव व शक्ति की उपासना के तौर पर देखता है। इस दिन भगवान भैरव की पूजा की जाती है। इसमें मांस और मछली का भोग लगाया जाता है। मछली का प्रचलन अधिक है क्योंकि कश्मीर में बर्फबारी के चलते बकरे का मांस मिलना आसान नहीं था। इस वजह से पंडित समुदाय में मछली का भोग लगाने का चलन बढ़ा।
कलश के लिए चश्मे का ताजा पानी न मिलने का गम
प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत और अनंतनाग के वेसू माइग्रेंट कॉलोनी में रहने वाले राकेश पंडिता ने बताया कि सदियों से चली आ रही परंपराएं अब भी निभाई जा रही हैं। हालांकि, इसमें थोड़ा बदलाव जरूर आया है। पहले गांव में चश्मे से ताजा पानी कलश के लिए लाया जाता था, लेकिन अब गांव छोड़कर कैंप में रहने से नल के पानी का प्रयोग करना पड़ रहा है। पहले की ही तरह सलाम की परंपरा अब भी जारी है। शिवरात्रि के अगले दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मुबारकबाद देने आते हैं। शिवरात्रि के चौथे दिन प्रसाद के रूप में चढ़ाया गया अखरोट सभी में वितरित किया जाता है। इसमें आस पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ ही रिश्तेदार भी शामिल होते हैं।
... ताकि भगवान भोले के बरातियों की आवभगत में न रहे कोई कमी
मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के खीरभवानी मंदिर के पास लार गांव के बद्री नाथ भट्ट व सुनील कुमार भट्ट का कहना है कि घरों में मिट्टी के कलश में भगवान को भोग लगाया जाता है। मांस व मछली का भोग लगाने के लिए डुलझी होती है। इसका प्रचलन इस वजह से है कि भगवान भोले के बरातियों की आवभगत में कोई कमी न रह जाए। उनका कहना है कि अखरोट को प्रसाद के रूप में इसलिए लिया जाता है क्योंकि उसकी चार गिरियां होती है जो चार वेदों का अहसास कराती हैं।