सांबा। शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक कामकाजी महिलाएं आज शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, निजी कंपनियों और सरकारी दफ्तरों में अहम भूमिका निभा रही हैं। उनकी दिनचर्या संघर्ष से भरी हुई है। सुबह घर की जिम्मेदारियों से शुरुआत और देर शाम तक ऑफिस की भागदौड़, यह अधिकांश महिलाओं की रोजमर्रा की हकीकत है।
स्थानीय स्कूल में कार्यरत शिक्षिका ज्योति देवी का कहना है कि सुबह बच्चों का टिफिन, सास-ससुर की देखभाल और घर का काम निपटाकर स्कूल पहुंचते हैं। लौटने पर फिर रसोई और बच्चों की पढ़ाई। नौकरी के बावजूद घरेलू जिम्मेदारी आज भी महिलाओं की ही मानी जाती है।
निजी कंपनी में काम करने वाली गीता देवी कहती हैं कि कंपनी में टारगेट का दबाव रहता है, वहीं घर में सब कुछ संभालने के चलते कई बार इतनी थकान होती है कि खुद के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। हालांकि परिवार के सामने मुस्कान बनाए रखनी पड़ती है।
महिला अधिकारों पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता व पूर्व सरपंच रीना चौधरी का कहना है कि कामकाजी महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या ‘दोहरी जिम्मेदारी’ है। जब तक घरेलू काम को साझा जिम्मेदारी नहीं बनाया जाएगा, तब तक महिलाएं मानसिक और शारीरिक दबाव में रहेंगी। उनके अनुसार ग्रामीण इलाकों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हैं। महिलाएं खेतों में काम भी करती हैं और घर भी संभालती हैं। फिर भी फैसलों में उनकी राय को कम अहमियत दी जाती है।
महिला सरपंच का मानना है कि समाज में सोच बदलने की जरूरत है ताकि महिलाएं सिर्फ जिम्मेदारियों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने सपनों और कॅरिअर को भी बराबरी के साथ आगे बढ़ा सकें।