जम्मू। अब एक नंबर डायल करने पर इच्छुक नेत्रदाता के घर पर सर्जन सहित एंबुलेंस पहुंच जाएगी। इसमें मृत व्यक्ति के घर पर ही उसकी आंखें निकालने की प्रक्रिया करके जीएमसी में प्रत्यारोपण करके जरूरतमंद लोगों को नई दुनिया दिखाने का काम किया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत डीजीएचएस (निदेशालय जनरल स्वास्थ्य विज्ञान) नई दिल्ली की ओर से नेत्र रोग विभाग जीएमसी जम्मू को नेत्र बैंक, कार्निया प्रत्यारोपण व रिट्रीवल सुविधा के लिए मानव अंग अधिनियम और ऊतक अधिनियम 1994 (थोटा) के तहत पांच साल के लिए पंजीकरण किया गया है. लेकिन विभाग में नेत्र प्रत्यारोपण की सुविधा को गति नहीं मिल पाई है, कारण लोगों में नेत्रदान को लेकर विभिन्न भ्रांतियों के साथ जागरूकता की कमी होना है।
नेत्ररोग विभाग की ओर से नेत्रदान के लिए व्यापक जागरूकता अभियान शुरू करने के साथ नेत्रदाता तक पहुंच बढ़ाने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। विभाग की ओर से चौबीस घंटे सक्रिय रहने वाली कई टीमों का गठन किया गया है। इसमें विभाग की ओर से फोन नंबर 0191-2584294 जारी किया गया है, जिस पर संपर्क करते हुए विभागीय टीम सर्जन, जरूरी उपकरण, एंबुलेंस और अन्य चिकित्सा स्टाफ के साथ मृतक के घर पर पहुंच जाएगा, जिसमें मौत के छह घंटे के भीतर मृतक की दोनों आंखे निकालने की प्रक्रिया होगी। इस बीच विभाग की टीम बी भी सक्रिय रहेगी जो प्रत्यारोपण प्राथमिकता सूची में शामिल मरीजों को सूचित करके बुला लेगी। मृतक के घर से उसकी दोनों आंखें निकालकर पैकिंग करके जीएमसी लाया जाएगा, जिसके बाद प्रत्यारोपण की प्रक्रिया की जाएगी। कोशिश की जाती है कि आंखें निकालने के बाद उसका 24 या 72 घंटे के भीतर प्रत्यारोपण कर दिया जाए। जितनी जल्दी प्रत्यारोपण होगा नतीजे भी बेहतर आएंगे।
जीएमसी के पास 25 मरीजों की प्राथमिकता सूची
नेत्ररोग विभाग जीएमसी के पास प्रत्यारोपण के लिए 25 मरीजों की प्राथमिकता सूची है। एक व्यक्ति की दो आंखें निकाल कर उसे दो जरूरतमंद मरीजों में डाला जाता है, ताकि एक एक आंख से दोनों मरीज देख सकें। अब तक विभाग में पंजीकरण के बाद दो मरीजों का कार्नियल प्रत्यारोपण किया गया है।
------
बिना शिनाख्त वाले शवों में कानूनी औपचारिकताएं चुनौती
नेत्रदान के लिए सबसे प्रमुख बिना शिनाख्त वाले शव होते हैं, लेकिन किसी की मौत पर छह घंटे के भीतर उसकी आंखे निकालना जरूरी होता है। मगर जीएमसी में पहुंचने वाले अधिकांश बिना शिनाख्त वाले शवों को कानूनी औपचारिकताओं के लिए करीब 72 घंटे शिनाख्त के लिए रखा जाता है, लेकिन इस अवधि में छह घंटे का समय निकल जाने से आंखें नहीं निकाली जाती हैं।
--------
जागरूकता को बढ़ाया जा रहा : एचओडी
नेत्र रोग विभाग के एचओडी प्रो. सतीश गुप्ता का कहना है कि कार्निया प्रत्यारोपण के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। विभाग ने प्रयास किया है कि नेत्रदाता तक सीधे पहुंचा जाए। इसके लिए विभिन्न टीमें काम करती हैं। विभागीय टीम मृतक के घर पर ही पहुंचकर आंख निकालने की प्रक्रिया करेगी।