जम्मू। प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में चल रहे बीस हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की संख्या औसतन 2 से तीन ही है। वहीं, दस हजार से ज्यादा केंद्रों में पंजीकरण औसतन दस से 15 के करीब है। कई केंद्र ऐसे भी हैं, जहां पर सिर्फ आंगनबाड़ी सहायिका या हेल्पर के बच्चे ही पढ़ने आते हैं।
शहरों की हालत यह है कि यहां लोग अपने बच्चों को केंद्र में नहीं भेजते। बताया जा रहा है कि यहां सिर्फ दोपहर का खाना मिलता है और पढ़ाई नहीं होती। पढ़ाई के नाम पर सिर्फ गिनती या अक्षर माला को ही पढ़ाया जाता है। यहां बाहरी राज्यों से आए प्रवासी लोगों के बच्चे ही पढ़ाई करते हैं।
आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की हालत ये है कि उन्हें अक्षर ज्ञान ही नहीं है। सही तरीके से बोल भी नहीं पाते हैं। बैठने के लिए अनुकूल जगह नहीं है। ऐसे में शहरों के लोग बच्चों को केंद्र के बजाय निजी स्कूलों में भेजते हैं।
प्रदेश भर में साठ हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं। इनमें ज्यादातर किराये के भवनों में चल रहे हैं। कई जगह बरामदों में ही नौनिहालों को बैठाया जा रहा है। इन केंद्रों को चलाने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। तीन हजार के करीब ऐसे आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जहां पर बच्चों के नाम तो अंकित हैं, लेकिन बच्चे नहीं आते। किशन नगर की रहने वाली महिला सुरभि, मोनिका और रेशम ने बताया कि केंद्रों में बच्चों की पढ़ाई नहीं होती है। सिर्फ खाना ही मिलता है। इससे बच्चों का भविष्य बर्बाद न हो उन्हें पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। प्रवासी महिलाए सोनू, गीता ने बताया कि वह यूपी की रहने वाली हैं। यहां पर दिहाड़ी का काम करती हैं और मजदूर बस्ती में रहती हैं। बच्चों को दोपहर का भोजन मिल जाता है और पढ़ाई भी हो जाती है। ऐसे में इनका दाखिला आंगनबाड़ी केंद्रों में करवाया है। सरकारी योजना का लाभ मिल रहा है।
कोट
कमियों को सुधारा जा रहा है। केंद्रों में पंजीकरण दर को बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। पढ़ाई के साथ बच्चों को भोजन भी दिया जा रहा है।
- टीना महाजन, निदेशक, आईसीडीएस