एलओसी के समीप बसा करमाड़ा गांव अब अमन की नई तस्वीर पेश कर रहा है। पिछले छह सालों में यहां के लोगों की जिंदगी में आए बदलावों ने साबित कर दिया है कि शांति का रास्ता कितना महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में स्थित करमाड़ा, जो भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा के बिल्कुल समीप है, अब एक नई पहचान बना चुका है। यहां की फसलें लहलहा रही हैं और लोग बिना किसी भय के अपने जीवन का आनंद ले रहे हैं। पिछले कई सालों तक गोला-बारूद की गूंज ने इस क्षेत्र को आतंकित किया था, लेकिन 2018 के बाद से स्थिति में भारी सुधार आया है।
मोहम्मद इखलाक, जो यहां के निवासी हैं, बताते हैं, 'पहले हमें रात में घर छोड़ना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होता। हमारी जान अब सुरक्षित है।' इखलाक के घर की छत से दिखाई देने वाले पक्के मकानों और बंकरों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जो शांति की ओर इशारा करती है। गांव के सरपंच मोहम्मद शरीफ का कहना है, 'पहले घर के बाहर निकलना मुश्किल था। अब हम बिना किसी डर के अपने खेतों में काम कर सकते हैं। हमारी एकमात्र उम्मीद है कि भविष्य में भी अमन बना रहे।'
करमाड़ा के साथ-साथ, गुलपुर गांव भी इसी तरह के बदलावों का गवाह बना है। किसान मोहम्मद रशीद कहते हैं, '2018 से पहले शाम होते ही घरों में कैद हो जाते थे। अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं, और हम अपने कामकाज में व्यस्त हैं।' राजनीतिक दृष्टिकोण से भी करमाड़ा का यह बदलाव महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र की राजनीति पर कांग्रेस, नेकां और पीडीपी का दबदबा रहा है, लेकिन अब भाजपा भी चुनावी मैदान में है। पूर्व विधायक शाह मोहमद तांत्रे ने कहा, 'भाजपा से मुकाबला है, और हमारी प्राथमिकता लोगों के लिए शांति बनाए रखना है।' करमाड़ा अब एक नई दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहां लोग शांति से जीने की उम्मीद कर रहे हैं। यह बदलाव न केवल स्थानीय निवासियों के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है।