2002 के चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। नेकां सबसे बड़ा दल बनकर उभरी, लेकिन कांग्रेस के सहयोग से पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। इसके बाद, 2014 तक किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया।
रेखा चौधरी, राजनीतिक मामलों की विशेषज्ञ, कहती हैं कि 13 पर्चे खारिज होने के बाद प्रजा परिषद ने कुछ नाम खुद ही वापस लेकर चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप नेकां सत्ता में आई और सदन में विपक्ष की कमी का लाभ उठाया। इस दौरान, प्रजा परिषद ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया और शेख अब्दुल्ला पर डोगरा विरोधी होने का आरोप लगाया। विवाद बढ़ने पर, केंद्र सरकार ने 1953 में शेख अब्दुल्ला को पद से हटाकर जेल भेज दिया। इस प्रकार, जम्मू-कश्मीर के चुनावों का इतिहास केवल चुनावों का नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का भी गवाह है।