सेना, नागरिक प्रशासन, कश्मीर यूनिवर्सिटी(केयू) और पर्यटन विभाग मिलकर दर्दी लोगों की संस्कृति व भाषा को बढ़ावा देगा। इसके संरक्षण के लिए जल्द उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एलओसी के पास गुरेज सेक्टर में जल्द शीना सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना होगी। शीना संस्कृति पर आयोजित वर्कशॉप में एक अधिकारी ने बताया कि गुरेज घाटी प्राचीन इतिहास के साथ दर्दिस्तान से भी जुड़ी है।
दर्द-शीन प्राचीन समुदाय है। इसे प्राचीन आर्यन का वंशज माना जाता है। यह 2000-1500 ईसा पूर्व भारत आए थे। वे हिमालय में फैले और बाद में हिमालय के पश्चिमी तथा पूर्वी क्षेत्रों में चले गए। ये क्षेत्र उत्तर पूर्वी अफगानिस्तान, गिलगित और जम्मू-कश्मीर का हिस्सा थे।
वर्तमान में बांदीपोरा जिला के गुरेज सब डिवीजन में अधिकांश दर्द-शीन बसे हुए हैं। गिलगित की राजधानी दर्दिस्तान का अधिकांश क्षेत्र उत्तरी क्षेत्रों के नाम से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के अंतर्गत आता है। शीना भाषा 12,352 वर्ग मील के विशाल क्षेत्र में बोली जाती है।
वर्तमान में दर्दी आबादी केवल जम्मू-कश्मीर राज्य के गुरेज़, तुलेल, चंद्रकोट और द्रास क्षेत्रों में मौजूद है। अन्य सभी क्षेत्र या तो पाकिस्तान के सीधे नियंत्रण में हैं या चीन के कब्जे में हैं। गुरेज के दर्द-शीना से पूर्व-ऐतिहासिक काल तक के ऐतिहासिक संदर्भों को देखा जा सकता है।
पड़ोसी और यूरोपीय राज्यों के आधिकारिक दरबारी कवियों के लेखन में कई संदर्भ मिलते हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शायद गुरेज़ वही बस्ती है, जिसका जिक्र प्रसिद्ध कश्मीरी इतिहासकार कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में दरतपुर यानी दर्द जाति के लोगों का शहर के नाम से किया था। गुरेज पहाड़ों से घिरा है। इसलिए संभव है कि इसी को गिरिगुप्त कहा गया हो। दर्दों की प्राचीन राजधानी डावर, गुरेज़ घाटी में है। यह महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।
शीना एक दर्दी भाषा है, जो पाकिस्तान–नियंत्रित गिलगित-बल्तिस्तान और भारत के लद्दाख तथा कश्मीर क्षेत्रों में बोली जाती है। यह जिन पाकिस्तान नियंत्रित वादियों में यह बोली जाती है, उनमें अस्तोर, चिलास, दरेल, तंगीर, गिलगित, ग़िज़र और बाल्तिस्तान और कोहिस्तान के कुछ हिस्से शामिल हैं। जिन भारत–नियंत्रित वादियों में यह बोली जाती हैं, उनमें गुरेज़, द्रास, कारगिल और लद्दाख के कुछ पश्चिमी हिस्से शामिल हैं।