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जम्मू-कश्मीर: अब शीना को मिला सेना का साथ, दर्दी भाषा को समृद्ध करने के लिए गुरेज में खुलेगा सांस्कृतिक केंद्र

Thu, 18 May 2023 06:49 PM IST
विमल शर्मा अमृतपाल सिंह बाली, श्रीनगर

सार

सेना संबंधित विभागों के साथ स्थानीय संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज को संरक्षित करने पर काम कर रही है। सेना की 109 इन्फेंट्री ब्रिगेड और जीआर के अलावा कश्मीर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लिंग्विस्टिक्स की ओर से वर्कशॉप आयोजित की गई।
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गुरेज में शीना भाषा को लेकर बैठक करते लोग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सेना, नागरिक प्रशासन, कश्मीर यूनिवर्सिटी(केयू) और पर्यटन विभाग मिलकर दर्दी लोगों की संस्कृति व भाषा को बढ़ावा देगा। इसके संरक्षण के लिए जल्द उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एलओसी के पास गुरेज सेक्टर में जल्द शीना सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना होगी। शीना संस्कृति पर आयोजित वर्कशॉप में एक अधिकारी ने बताया कि गुरेज घाटी प्राचीन इतिहास के साथ दर्दिस्तान से भी जुड़ी है।

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अब सेना संबंधित विभागों के साथ यहां की संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज को संरक्षित करने पर काम कर रही है। वर्कशॉप सेना की 109 इन्फेंट्री ब्रिगेड और 2/3 जीआर के अलावा कश्मीर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लिंग्विस्टिक्स की ओर से आयोजित की गई।

वर्कशॉप में गुरेज, श्रीनगर और दिल्ली के 50 प्रमुख लोगों ने भाग लिया। वहीं, गुरेज़ से सेना के उच्च अधिकारी के अलावा शिक्षा विभाग से प्रिंसिपल्स, लेक्चरर और शिक्षक शामिल रहे। पर्यटन से जुड़े लोग भी शामिल हुए। कश्मीर यूनिवर्सिटी के डॉ. मुसव्विर ने तीन वर्गों में वर्कशॉप का संचालन किया।
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प्रिंसिपल हायर सेकेंडरी स्कूल द्रग्गर बडगाम मुश्ताक़ अहमद शेख ने कहा कि वर्कशॉप का उद्देश्य गुरेज़ की संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज को संरक्षित और समृद्ध करना है। यहां म्यूजियम बनाने की योजना बनाई जा रही है। यहां के लोग मास माइग्रेशन की ओर बढ़ रहे हैं।

यहां की भाषा, संस्कृति, परंपरा विलुप्त होने की कगार पर है। ऐसे में एक म्यूजियम की जरूरत है। वहीं, होटल इंडस्ट्री से गुलाम नबी ने कहा कि वर्कशॉप में दर्द समुदाय के रीति रिवाजों को लुप्त होने से बचाने के लिए स्कूली स्तर पर प्रयास करने पर विचार किया गया।

आर्यन का माना जाता है वंशज

दर्द-शीन प्राचीन समुदाय है। इसे प्राचीन आर्यन का वंशज माना जाता है। यह 2000-1500 ईसा पूर्व भारत आए थे। वे हिमालय में फैले और बाद में हिमालय के पश्चिमी तथा पूर्वी क्षेत्रों में चले गए। ये क्षेत्र उत्तर पूर्वी अफगानिस्तान, गिलगित और जम्मू-कश्मीर का हिस्सा थे।

वर्तमान में बांदीपोरा जिला के गुरेज सब डिवीजन में अधिकांश दर्द-शीन बसे हुए हैं। गिलगित की राजधानी दर्दिस्तान का अधिकांश क्षेत्र उत्तरी क्षेत्रों के नाम से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के अंतर्गत आता है। शीना भाषा 12,352 वर्ग मील के विशाल क्षेत्र में बोली जाती है।

वर्तमान में दर्दी आबादी केवल जम्मू-कश्मीर राज्य के गुरेज़, तुलेल, चंद्रकोट और द्रास क्षेत्रों में मौजूद है। अन्य सभी क्षेत्र या तो पाकिस्तान के सीधे नियंत्रण में हैं या चीन के कब्जे में हैं। गुरेज के दर्द-शीना से पूर्व-ऐतिहासिक काल तक के ऐतिहासिक संदर्भों को देखा जा सकता है।

दर्दों की प्राचीन राजधानी डावर में

पड़ोसी और यूरोपीय राज्यों के आधिकारिक दरबारी कवियों के लेखन में कई संदर्भ मिलते हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शायद गुरेज़ वही बस्ती है, जिसका जिक्र प्रसिद्ध कश्मीरी इतिहासकार कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में दरतपुर यानी दर्द जाति के लोगों का शहर के नाम से किया था। गुरेज पहाड़ों से घिरा है। इसलिए संभव है कि इसी को गिरिगुप्त कहा गया हो। दर्दों की प्राचीन राजधानी डावर, गुरेज़ घाटी में है। यह महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।

यहां बोली जाती है शीना भाषा

शीना एक दर्दी भाषा है, जो पाकिस्तान–नियंत्रित गिलगित-बल्तिस्तान और भारत के लद्दाख तथा कश्मीर क्षेत्रों में बोली जाती है। यह जिन पाकिस्तान नियंत्रित वादियों में यह बोली जाती है, उनमें अस्तोर, चिलास, दरेल, तंगीर, गिलगित, ग़िज़र और बाल्तिस्तान और कोहिस्तान के कुछ हिस्से शामिल हैं। जिन भारत–नियंत्रित वादियों में यह बोली जाती हैं, उनमें गुरेज़, द्रास, कारगिल और लद्दाख के कुछ पश्चिमी हिस्से शामिल हैं।

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