एजेंसियों की यह उपलब्धि है कि उन्हें पता है आतंकी कौन हैं और कहां से आए हैं। सीमापार से एक-एक आतंकी की घुसपैठ रोकना मुमकिन नहीं है। कठुआ और डोडा जिले में सक्रिय आतंकी आम व्यक्ति की तरह बाजार या गांव में घूमते रहे होंगे पर अब ऐसा नहीं होगा। अब लोगों से एजेंसियों को इनपुट मिलेगा और आतंक पर प्रहार होगा।
कठुआ में आतंकी ठिकाना नष्ट करना उसके बाद मुठभेड़ में आतंकियों को मार गिराना बड़ी सफलता है कठुआ में अभी यस आतंकी को मारना बता रहा है की सुरक्षा एजेंसियों को आतंकी के मूवमेंट पर नजर है जवाब दे ही बढ़ने से एजेंसी अब समन्वय के साथ ऑपरेशन को अंजाम दे रही है।
इसी का परिणाम है कि सफलता दर 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंची। आम लोगों का भी सहयोग मिल रहा है। पुलवामा हमले से पहले आतंक पर कार्रवाई होती थी लेकिन एजेंसियों के बीच तालमेल और जवाबदेही उतनी मजबूत नहीं थी। पुलवामा व पहलगाम से साफ संदेश गया कि रणनीति में मूलभूत बदलाव जरूरी है।
घुसपैठ के बाद आतंकी किन रूट का इस्तेमाल कर रहे हैं
कठुआ से किश्तवाड़ के बीच नदियां, घने जंगल, सियोजधार बेल्ट, बसोहली, छत्रगलां, गंदोह, काटरी, सिंथन टॉप और त्राल जैसे इलाके लंबे समय से घुसपैठ के रूट रहे हैं। गलवान से पहले तक इन रूटों पर सेना की तैनाती थी। इलाके में शांति मानकर सेना की यूनिट हटा दी गई। इस बीच आतंकियों ने इस क्षेत्र में फिर नेटवर्क सक्रिय किया। घुसपैठ के बाद पैसे का लालच देकर डराकर या धर्म के नाम पर स्थानीय लोगों को बरगलाया गया। कठुआ में आतंकी ठिकाने से रोजमर्रा का सामान मिलना बताता है कि आतंकियों का स्थानीय संपर्क कितना मजबूत है