कहा- देरी के कारण वास्तविक तो न्यायालय अपना सकता है उदार दृष्टिकोण
सुनवाई के बाद याचिका की खारिज
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। एक मामले में फैसला सुनाते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सीमा कानूनों उद्देश्य अधिकारों को नष्ट करना नहीं, बल्कि देरी को रोकना है। प्रत्येक कानूनी उपाय को विधायी रूप से निर्धारित अवधि के भीतर पूरा कर लेना चाहिए, लेकिन यदि देरी के वास्तविक कारण मौजूद हैं तो उदार दृष्टिकोण रखा जा सकता है। इसी के साथ अपील (एलपीए) को खारिज कर दिया।
इसमें एक समीक्षा याचिका दायर करने में छह साल से अधिक की देरी को मान्य करने को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने ये फैसला भूमि विवाद से संबंधित एक मामले में सुनाया है। तेजा सिंह सहित दो अन्य अपीलकर्ताओं ने कथित तौर पर संरक्षित किरायेदार के रूप में 85 कनाल भूमि पर खेती की थी, लेकिन 1970 में अब्दुल अजीज ने उन्हें जबरन बेदखल कर दिया गया था।
इसके खिलाफ उन्होंने अपील की। इसपर अपीलीय अधिकारियों ने बेदखली को बरकरार रखा, हालांकि जम्मू-कश्मीर विशेष न्यायाधिकरण ने 2010 में इसे उलट दिया। 2017 में हाईकोर्ट की एकल पीठ बेदखली को बहाल कर दिया, लेकिन एक खंडपीठ ने प्रक्रियात्मक आधार पर 2017 में इस फैसले को पलट दिया। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसने 2023 में खंडपीठ के फैसले को खारिज कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया।
अब्दुल अजीज ने अपना एलपीए वापस ले लिया और 2,400 दिनों से अधिक की देरी के बाद समीक्षा याचिका दायर की। एकल पीठ ने देरी को मान्य कर दिया। जिसके कारण अपीलकर्ताओं ने वर्तमान अपील दायर की।
यह हैं सीमा कानून
सीमा कानून वे कानून हैं जो कानूनी कार्यवाही दायर करने के लिए समय सीमा निर्धारित करते हैं। ये कानून सिविल और आपराधिक दोनों मामलों पर लागू होते हैं। सीमा कानून यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि जिन लोगों के साथ अन्याय हुआ है, वे उचित समय सीमा के भीतर न्याय पाने में सक्षम हों। हत्या जैसे अधिक गंभीर अपराधों के लिए अक्सर कोई समय सीमा नहीं होती।