ढोल की थाप और लोकधुनों के साथ झूमते बच्चे, युवा और बुजुर्ग। खरीफ सीजन में पानी से भरे खेतों में धान रोपते किसान। रोपाई के लिए तैयार खेत की गीली मिट्टी का लेप लगाते और एक दूसरे को पानी में घसीटकर अठखेलियां करते किशोर। पुंछ जिले के एलओसी से सटे इलाकों में धान की रोपाई के समय जश्न जैसा यह माहौल पुरानी परंपरा रही है, लेकिन यह दृश्य बरसों बाद इन दिनों देखने को मिल रहे हैं।
एलओसी पर सीजफायर उल्लंघन की घटनाओं से सदियों पुरानी परंपरा पर ग्रहण लग गया था। भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच संघर्ष विराम समझौते से धान की रोपाई की जश्न सरीखी परंपरा यहां पांच साल बाद देखने को मिल रही है।
पिछले कई वर्षों से एलओसी पर गोलाबारी से खरीफ सीजन की इस खास परंपरा का निर्वहन नहीं हो पा रहा था। अग्रिम इलाकों में कुछेक लोग धान की रोपाई करते भी तो पाकिस्तानी सेना की नजर से बचते बचाते। ढोल की थाप और लोकगीत एक तरह से भुला दिए गए थे, लेकिन इस बार खेतों में सदियों पुरानी परंपरा फिर जी उठी है।
नियंत्रण रेखा पर शांति की कर रहे दुआ
नियंत्रण रेखा से सटे बगयालदरा, दलान, माल्टी, दिगवार, खड़ी, करमाड़ा, अजोट, गुलपुर, सलोत्री, मनकोट, बलनोई, घानी, सावजियां, उढ़ीपुरा के किसान खुशनुमा माहौल में धान की रोपाई कर रहे हैं। इस बार किसानों में काफी खुशी का माहौल है और वह ऊपर वाले से इसी प्रकार नियंत्रण रेखा पर शांति बनी रहने की दुआ मांग रहे हैं।
अजोट में धान रोपाई के साथ खेत में मस्ती करते युवाओं विक्की, अंकुश, इमरान, रसमीत ने कहा कि यह इलाका नियंत्रण रेखा के काफी करीब है। यहां अकसर पाकिस्तानी सेना गोले बरसाती थी। इस तरफ घर वाले आने भी नहीं देते थे। इस बार गोलाबारी बंद है। कोरोना महामारी में स्कूल भी बंद हैं। हम घर वालों के साथ दिन भर खेतों में काम और मौजमस्ती करते हैं।