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Jammu News: जगती के विस्थापितों को पैबंद नहीं, अब पूरी मरम्मत चाहिए

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विस्थापितों की व्यथा
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- 4200 फ्लैटों में करीब 20 हजार लोग, प्लास्टर उखड़ा, छतें टपक रहीं, दरवाजे-खिड़कियां भी जर्जर
- दो-तीन दिन तक पानी नहीं आता, पार्कों में उगी झाड़ियां और टूटी सड़कों से भी लोग परेशान
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। कश्मीरी पंडित विस्थापितों की सबसे बड़ी बस्ती जगती मिनी टाउनशिप अब जर्जर आवासों और बदहाल सुविधाओं से जूझ रही है। करीब 4200 फ्लैटों में रहने वाले लगभग 20 हजार लोगों के लिए उखड़ता प्लास्टर, टपकती छतें, टूटे दरवाजे-खिड़कियां और चरमराती जलापूर्ति रोजमर्रा की परेशानी बन चुके हैं।
मार्च 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टाउनशिप का उद्घाटन किया था। विस्थापित परिवारों को उम्मीद थी कि यहां उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक आवास मिलेगा, लेकिन वर्षों के रखरखाव के अभाव ने इन घरों की हालत बिगाड़ दी। कई फ्लैटों में दीवारों और छतों का प्लास्टर झड़ चुका है। पानी की व्यवस्था भी लोगों की जरूरत पूरी नहीं कर पा रही।
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निवासियों का कहना है कि कभी-कभार की जाने वाली छोटी-मोटी मरम्मत से समस्या दूर नहीं होगी। जिन परिवारों ने घाटी से विस्थापन का दर्द झेला, उनके लिए जर्जर मकान अब दूसरी पीड़ा बन गए हैं। कहते हैं कि अब पैबंद नहीं, पूरी मरम्मत चाहिए। उनका सवाल है कि विस्थापन के डेढ़ दशक बाद भी सुरक्षित और सम्मानजनक घर के लिए उन्हें और कितना इंतजार करना होगा। अब उन्हें पैबंद नहीं, पूरी मरम्मत चाहिए।

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प्लास्टर गिरने का डर, बरसात में रात जागकर कटती है

वरिष्ठ नागरिक सुनील कुमार दवन, गुरमीत सिंह और बीएन बजाज बताते हैं कि टॉउनशिप में मौजूद 4200 फ्लैट में शायद ही कोई ऐसा फ्लैट होगा जिसमें किचन, बाथरूम और रूम का प्लास्टर न उखड़ गया हो। कई दफा तो प्लास्टर ऊपर गिरने से लोग चोटिल भी हो चुके हैं। बरसात के दिनों में छतों की हालत झरने जैसी हो जाती है। मरम्मत के लिए गुहार लगाते-लगाते थक गए हैं। खिड़की-दरवाजे भी उम्र पूरी कर चुके हैं।
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पानी की समस्या ने बढ़ाई परेशानी
वरिष्ठ नागरिक सुमित पंडिता और राजिंद्र सिंह कहते हैं कि जगती प्रवासी शिविर में वाटर सप्लाई का बुरा हाल है। आपूर्ति का कोई समय निश्चित नहीं है। कई दफा तो दो-तीन दिन तक पानी नहीं आता है। दफ्तरों में फरियाद अनसुना करने पर अधिकतर लोगों ने मिलकर तीन-चार ब्लॉक के बीच अपना खुद का वाटर पंप लगा लिया है। लेकिन बुजुर्गाें और महिलाओं को दूसरी-तीसरी मंजिल तक पानी ले जाने में काफी दिक्कत होती है।
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पार्कों में झाड़ियां, सड़कों की हालत भी खराब
बोलने में अक्षम पति-पत्नी शंकर सिंह और राधा देवी इशारों में बताती हैं कि गंदगी से बुरा हाल है। सड़कें टूटी हुई हैं। सभी पार्क जंगल तब्दील होते जा रहे हैं। कमरों से लेकर बरामदे तक का प्लास्टर उखड़ चुका है। बिजली की आपूर्ति बेहतर है लेकिन उसके पैनल बॉक्स जर्जर हो चुके हैं। बस यूं समझ लीजिए कि विस्थापन का दर्द ये जर्जर मकान कभी कम नहीं होने देता है। बरसात में रात जागते हुए गुजरती है।
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