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जम्मू-कश्मीर : खामोश हो गई वो नटखट, जिंदादिल क्वीन ऑफ वार्ड, नम हुईं नर्स और स्टाफ की आंखें

Sun, 13 Feb 2022 07:24 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमृतपाल सिंह बाली, श्रीनगर

सार

दो दशक से भी ज्यादा समय से श्रीनगर के अस्पताल में इलाजरत थी कश्मीरी पंडित मंजू।
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सन्नाटे का आलम... - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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अस्पताल की सबसे नटखट और चुलबुली कश्मीरी पंडित मंजू (बदला हुआ नाम) डॉक्टर से लेकर नर्स और तमाम स्टाफ सदस्यों के साथ खूब हंसी ठिठोली करती। उसके चेहरे पर मुस्कान बनी रहती। कभी डॉक्टर का पेन लेकर पन्ने पर कुछ लिखकर डॉक्टर से हस्ताक्षर करवाती तो कभी किसी और नटखट हरकत से सभी को हंसाती। 

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लता मंगेशकर के गाने सुनने की शौकीन मंजू कुछ दिन पहले तक आने वाला पल, जाने वाला है... गाना गुनगुना रही थी। दो दशक से भी ज्यादा समय से रैनावारी इलाके में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस (आईएमएचएएनएस) में भर्ती मंजू आठ फरवरी को हार्ट अटैक होने पर चल बसीं। अस्पताल में उसे क्वीन ऑफ वार्ड कहकर पुकारा जाता था। आज उसका खाली बिस्तर देख डॉक्टर, नर्स और स्टाफ सदस्यों की आंखें नाम हो रही हैं। 

नब्बे के दशक में आतंकवाद चरम पर था। उसी दौरान मानसिक रोग से ग्रस्त मंजू को यहां भर्ती कराया गया। अब वार्ड पांच में सन्नाटा पसरा है। 55 साल की मंजू को डॉक्टर, नर्स और यहां तक कि स्टाफ के अन्य तमाम सदस्य भावुक होकर याद कर रहे हैं। मंजू के साथ सभी का भावनात्मक लगाव हो गया था। मंजू के परिवार ने इतने वर्षों तक उपचार करने के लिए अस्पताल के स्टाफ का व प्रबंधन का आभार जताया है। 
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आईएमएचएएनएस की महिला डॉक्टर ने बताया कि मंजू जब बीमार हुई तो उनकी मां ने उन्हें कश्मीर के इस अस्पताल में ही भर्ती कराना सही समझा। तब से उनका इलाज यहीं पर चल रहा था। मंजू शुरू से ही चुलबुली, नटखट और खुशमिजाज रही हैं। वो सबके साथ हंसती खेलती रहती थीं। मंजू को लता मंगेशकर के गाने बहुत पसंद थे और वार्ड से हमेशा गाने गुनगुनाने की आवाज आती थी। 

डॉक्टर ने बताया कि जब भी कोई उसके वार्ड में जाता तो सबसे पहले वह दौड़ कर उनके पास आती थी। हाथ पकड़कर खेलती थी। उसके साथ सभी की यादें जुड़ी हुई हैं। आज यह बिस्तर खाली देख दिल दुखी होता है। ऐसा लगता है जैसे हमने कोई अपने परिवार का सदस्य खोया हो। डॉक्टर ने कहा कि उसकी जिंदादिली के लिए डॉक्टर, नर्सें और अन्य स्टाफ उन्हें क्वीन ऑफ वार्ड के नाम से बुलाते थे।  

सिजोफ्रेनिया बीमारी थी मंजू को 
अस्पताल के एचओडी डॉ. मोहम्मद मकबूल ने बताया कि मंजू को सिजोफ्रेनिया (मानसिक विकार) की बीमारी थी। इस बीमारी में मरीज अपना ख्याल नहीं रख पाता। वह खुद से बातें करता है और कभी कभार आक्रोशित भी हो जाता है। पिछले कुछ महीनों से वह बीमार थी। 8 फरवरी को उन्हें चक्कर आया तो तुरंत जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल अस्पताल ले गए, लेकिन बचा नहीं पाए। बताया जा रहा है कि मंजू को हार्ट अटैक आया था।  

बाकी मरीजों को बताया, दूसरे अस्पताल में चल रहा है इलाज 
डॉ. मकबूल के अनुसार मंजू को अंतिम संस्कार से पहले डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों ने नहलाया और कफन व बाकी सामग्री का इंतजाम भी किया। इसके बाद गर स्थित शमशान घाट में परिवार की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया। एक अन्य डॉक्टर ने कहा कि आज भी वार्ड के बाकी मरीज पूछते हैं कि मंजू कहां गई तो हम उन्हें यह कहते हैं कि उसकी तबियत ठीक नहीं है दूसरे अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।
  
पिता के देहांत के बाद डिप्रेशन में चली गई मंजू
मंजू की बड़ी बहन सुजाता जलाली ने बताया कि वह तीन बहने हैं। इनमें मंजू मंझली थीं। वह श्रीनगर के पुराने शहर के हब्बाकदल में रहते हैं। सुजाता ने बताया कि उनके माता-पिता ने आतंकवाद के दौरान पलायन नहीं किया था। उनके पिता का देहांत 1996 में हुआ था और उस समय आतंकवाद चरम पर था। पिता के देहांत के बाद परिवार में केवल मां और तीन बेटियां रह गईं। हमारा कोई भाई नहीं था। हालात और घर की स्थिति को देखकर वह डिप्रेशन में चली गई। 

सुजाता ने बताया कि मंजू पोस्ट ग्रेजुएट थीं, लेकिन उसकी हालत बिगड़ने हम उसे इलाज के लिए चंडीगढ़, जम्मू आदि ले गए। उन्होंने बताया कि उनकी सबसे छोटी बहन जम्मू में रहती है और वह खुद श्रीनगर में, जबकि मां अभी भी नॉन माइग्रेंट है। बुजुर्ग होने के चलते सर्दियों में वह जम्मू और गर्मियों में श्रीनगर चली जाती हैं। सुजाता ने बताया कि उनकी बहन की मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण कभी वो घर से भाग जाती थी कभी हिंसक हो जाती थी। मां के अकेली होने के चलते उसे 1999 में आईएमएचएएनएस रैनावारी में भर्ती किया गया। सुजाता ने यह भी कहा कि जिस तरीके से उनकी बहन की देखरेख की गई। इसके लिए वह और उनका परिवार हमेशा अस्पताल प्रबंधन का आभारी है।     

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