सत्तारूढ़ पक्ष के सांसद आगा रुहुल्ला मेहदी से लेकर पुलवामा से पीडीपी के विधायक वहीद पर्रा मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं। वहीं, भाजपा इसे राजनीतिक से ज्यादा कुछ नहीं मान रही है। सामाजिक संगठनों का इस मुद्दे पर अलग मत है। वह राजनीतिक दलों पर आरक्षण को कमजोर करने का आरोप लगा रहा हैं।
मंगलवार को अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में राजनीतिक दलों व सामाजिक संगठनों के लोगों ने इस विषयों पर चर्चा की। उन्होंने जातीय जनगणना को आरक्षण के मौजूदा मुद्दे का समाधान भी बताया। प्रदेश सरकार से बिहार की तर्ज पर जातीय जनगणना करवाने का आह्वान किया।
जातीय जनगणना होती तो यह समस्या न होती
देश में 1931 के बाद जातीय जनगणना रोकी गई। अगर होती तो आज कोई समस्या नहीं होती। केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग को जो आरक्षण दिया है वह प्रदेश में लागू नहीं हुआ। यहां आरबीए के नाम पर लोगों को आरक्षण दिया गया, जो देश में कही नहीं है। प्रदेश में ओबीसी के लिए 13 आयोग बनाए हैं, लेकिन एक भी ओबीसी का प्रतिनिधि नहीं था।
सरकार को आरबीए व एएलसी को क्षैतिज आरक्षण देनी चाहिए था, लेकिन दिया वर्टिकल। ओबीसी का आरक्षण बांट दिया है। हक छिना गया। यहीं कारण है की विधानसभा में ओबीसी समुदाय का विधायक नहीं है। आरक्षण को कमजोर किया जा रहा है। अगड़ी जातियों को लाभ दिया जा रहा है।- बंसी लाल, संयोजक, ओबीसी महासभा
सरकार जातीय जनगणना से करे विवाद का हल
सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी तक तय की है। जम्मू-कश्मीर में नए आरक्षण नीति से पुनः संरचना हुई। इसमें कुछ बदलाव हुए और आरक्षण 50 फीसदी के कोटे से ऊपर चला गया। जम्मू-कश्मीर में ऐसी स्थिति बनी है, जहां हाशिये पर रहे समुदाय को लग रहा है उनका शोषण करने वालों को भी आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है।
सरकार को इस विवाद का हल जातीय जनगणना से करना चाहिए। प्रदेश सरकार को अपने स्तर जनगणना करवानी चाहिए। इससे हर जातियों के लोगों की संख्या की जानकारी मिलेगी। जम्मू-कश्मीर में बढ़ती बेरोजगारी में आरक्षण के वर्तमान मुद्दा में मिट्टी के तेल की तरह काम कर रही है। आरक्षण के मुद्दों जम्मू-कश्मीर की राजनीति जातीय राजनीति की तरह बढ़ रही है।- आदित्य गुप्ता, प्रवक्ता, पीडीपी
सत्ता में रहे दलों ने सही ढंग से लागू नहीं किया आरक्षण
जम्मू-कश्मीर में लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला है। ओबीसी वर्ग के लोगों को अधिकारों से वंचित रखा गया। सरकार ने आरक्षण को सामाजिक उत्थान की बजाय वित्तीय उत्थान के रूप में लिया है। प्रदेश में जो भी राजनीतिक दल सत्ता में रहे हैं, उन्होंने आरक्षण को उचित रूप से लागू नहीं किया। अनुच्छेद 370 हटने के बाद सरकार ने 14 जातियों को जोड़ा और आरक्षण को कमजोर किया।
ओबीसी आयोग का तो गठन किया गया है, लेकिन उस समुदाय के लोगों को प्रतिनिधित्व ही नहीं दिया गया। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि कश्मीर संभाग में आरक्षित समुदाय नहीं है, उनका ये बयान गलत है। वहां बड़ी संख्या में आरक्षित समुदाय हैं। देश में चार कैटेगरी एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्लयूएस हैं। प्रदेश में सभी समुदायों को इन कैटेगरी में शामिल करना चाहिए।- चरणजीत चरगोत्रा, प्रवक्ता, बसपा
आरक्षण पर राजनीति से आ रहा हिंदू व देश विरोधी भाव
वर्तमान में आरक्षण को लेकर जारी राजनीति से हिंदू और देश विरोधी भाव आ रहा है। अगर जाति जनगणना करनी है तो हर धर्म में होनी चाहिए। वर्तमान आरक्षण के मामला न्यायालय में है और सरकार ने उप समिति बनाई है। इसपर ज्यादा बोलना ठीक नहीं है। 15 मार्च 2024 में 176 के एसआरओ में कुछ नहीं बदला है।
पता नहीं विरोध क्यों है। जो पार्टियां 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण होने की बात करती हैं वह तमिलनाडु में 69 फीसदी तक आरक्षण पहुंचने पर बात नहीं करती हैं। जम्मू-कश्मीर में कभी अल्पसंख्यक आयोग नहीं बना। यहां पर कमजोर वर्ग के लोगों को अधिकारों से वंचित रखा गया। भाजपा ने प्रदेश में अवसर बढ़ाए हैं जिससे हर क्षेत्र के लोगों को लाभ मिला। हम ईडब्ल्यूएस को निशाना नहीं बना सकते है। उन्होंने कोई दोष नहीं किया है।- गिरधारी लाल रैना, प्रवक्ता, भाजपा
प्रदेश में आरक्षण को कमजोर करने की हो रही कोशिश
जम्मू-कश्मीर में आरक्षण को कमजोर करने की हर कोशिश की जा रही है। बार्डर इलाके में सरकार ने एससी और ओबीसी को उनकी जाति में रखा है, लेकिन अगड़ी जाति के लोगों को ईडब्लूएस में नहीं रखा। उनके लिए अलग से एएलसी व आईबीए में रखा। भाजपा आरक्षण को पूरी तरह बदल रही है।
ये इसलिए किया ताकि सामाजिक न्याय एससी, एससी और ओबीसी को आरक्षण के माध्यम से न मिले। 2015 में विधानसभा में पेश आंकड़े के अनुसार प्रदेश में पांच लाख नियमित कर्मचारी हैं, लेकिन तीन लाख ऐसे कर्मचारियों की नियुक्ति आरक्षण के नियमों को ताक पर रखा कर की गई है। वर्तमान में नई आरक्षण नीति को न्यायालय में चुनौती मिली है, जिस पर सभी हितधारकों को बुलाया गया है।- आरके कलसोत्रा, राज्य अध्यक्ष, ऑल इंडिया कंफेडेरेशन ऑफ एससी एसटी ओबीसी आर्गनाइजेशन जेएंडके
जातीय जनगणना देश को बांटने का करेगी काम
सुप्रीम कोर्ट के निदेश है आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में आरक्षण 65 फीसदी तक पहुंच गया है। इससे ओपन मेरिट प्रभावित हो रहा है। सरकार ने पहाड़ी समुदाय को दस फीसदी आरक्षण दिया जो ओपन मेरिट को प्रभावित कर रहा है। सरकार की मुख्य कोशिश है की आरक्षण की तय सीमा को 50 फीसदी तक रखा जाएगा, ताकि सुप्रीम कोट के निर्देशों का पालन हो सके।
आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित ओपन मेरिट प्रभावित हो रहा है। यही कारण है कि नेकां के सांसद ने इस विषय को उठाया है ताकि ओपन मेरिट के हिताें का संरक्षण हो। आरक्षण विवाद को जातीय जनगणना से हल नहीं किया जा सकता। जातीय जनगणना देश को बांटने को काम करेगी।- दिनेश चौहान, अध्यक्ष, नेकां लीगल सेल
सरकार मुद्दों को गंभीरता से सुलझाए, हासिल करे समर्थन
संविधान के तहत जिसे जो अधिकार मिले हैं वह मिलते रहने चाहिए। आरक्षण के मुद्दों पर जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक उपसमिति बनाई है। सरकार को चाहिए की वह इन मुद्दों को गंभीरता से सुलझाए, सभी हितधारकों का समर्थन हासिल करे, ताकि किसी के अधिकारों का हनन न हो सके।- रमण भल्ला, कार्यकारी अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस