सर्विस सेक्टर से हटकर इंडस्ट्री पर बढ़ानी होगी निर्भरता
आजादी के बाद से ही जम्मू-कश्मीर में सरकारें अस्थिर रही हैं। आतंकवाद, अलगाववाद की आग में अधिकतर हिस्सा झुलसता रहा है। यही कारण है कि यहां की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिर्फ सर्विस सेक्टर पर ही टिका रहा। एक आंकड़े के मुताबिक राज्य की अर्थव्यवस्था में करीब 30 फीसदी हिस्सा तो सर्विस सेक्टर का रहा है। ऐसे में जरूरी है कि राज्य सरकार को स्टार्टअप को आगे बढ़ाना होगा। युवाओ को नौकरी की जगह उद्योगों के लिए प्रोत्साहित करना होगा और उन्हें शुरूआती रियायतें भी देनी होंगी। राज्य में अलग-अलग सेक्टरों से पैसा आना शुरू होगा तो किसी एक क्षेत्र में निर्भरता खत्म हो जाएगी। इसके साथ ही घटते राजकोष को भी इसी से संभाला जा सकता है।
बड़े काश्तकारों के साथ छोटों को भी खेती के आधुनिक तरीकों से जोड़ना होगा
पिछले कुछ सालों में बड़े काश्तकार तो खेती के आधुनिक तरीकों से जुड़ गए लेकिन छोटे काश्तकार अभी भी पारंपरिक तरीके से खेती कर रहे हैं। एक विश्विद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर के मुताबिक सेब, अखरोट या दलहन की फसलें पैदान करने वाले कुछ बड़े काश्तकारों को छोड़ दें तो अधिकतर अभी भी पुराने पारंपरिक तरीके से ही काम कर रहे हैं। कारण, सरकार ने खेती को लेकर यहां कभी बड़ी योजनाएं उस तरह से नहीं बनाईं जिस तरह से पोड़ोसी राज्य पंजाब या फिर हरियाणा में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार यदि खेती के क्षेत्र में योजनाएं लाएं और किसानों को प्रशिक्षण देकर आधुनिक तरीके से खेती कराए तो अखरोट का रकबा एक लाख हेक्टयेर तक पहुंच सकता है और फलों की पैदावार दोगुनी हो सकती है।
कश्मीर में लाना होगा बाहरी निवेश
जम्मू में बड़ी छोटी मिलाकर करीब 600 से अधिक यूनिट हैं। यह इस राज्य की अर्थव्यवस्था की धुरी हैं, लेकिन इसका एक चौथाई निवेश भी कश्मीर में नहीं है। 100 के करीब छोटी-बड़ी यूनिट हैं भी तो वे सभी स्थानीय लोगों की हैं। कई पुश्तैनी काम तो बंद होने की कगार पर हैं जिनमें कालीन की कारीगरी प्रमुख है। श्रीनगर के उस्मान ने बताया कि श्रीनगर में गुलाब जल का बड़े स्तर पर एक ही व्यक्ति काम कर रहा है, लेकिन उसे भी सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया। नतीजा यह निकला कि उस परिवार की नई पीढ़ी अब इस व्यवसाय से नहीं जुड़ी है। यह कारोबार भी अब बंद होने को है जबकि कश्मीर में फूलों की खेती बड़े स्तर पर होती है और इत्र का काम भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। इस इंडस्ट्री से भी सरकार को अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान मिल सकता है।
नशा-आतंकवाद-अलगाववाद के गठजोड़ को तोड़ना जरूरी
राज्य में अस्थिरता और बेरोजगारी के बीच पिछले दो दशक में एक और बड़ी चुनौती इस राज्य के सामने बनकर उभरी है। वह है, इसके अलगाववाद-आतंकवाद-नशे का गठजोड़। इससे निपटना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अभी भी कश्मीर में गाहे-बगाहे कश्मीर विवाद का मुद्दा उठता है। अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग तो क्षेत्रीय दल भी कर रहे हैं। ऐसे में नशे के रास्ते से युवाओं को भटकाने की चाल चली जाती है। वही युवा इनके आंदोलन का हिस्सा बनते हैं।