वर्ष 2013 में मामला दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट के न्यायाधीश संजीव कुमार व मोक्षा खजूरिया काजमी की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष यह स्थापित करने में सफल हो सकता है कि बच्चे की मृत्यु जहर दिए जाने के कारण हुई।
फिर भी रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता द्वारा जहर दिया गया था। बोतल में बचे हुए जहर की बरामदगी बिल्कुल भी साबित नहीं हुई है। हमारे लिए अभियोजन पक्ष की कहानी पर विश्वास करना मुश्किल है कि अपीलकर्ता ने बच्चे को जहर दिया, जिसे वह एक छोटी बोतल में लाया था। जहर देने के बाद अपीलकर्ता ने बचे हुए जहर वाली बोतल को खेतों में छिपा दिया।
इसे अभियोजन पक्ष ने घटना के एक महीने से अधिक समय बाद बरामद किया।खंडपीठ ने कहा कि एक व्यक्ति जो किसी व्यक्ति को मारने के लिए जहर देता है, वह बचे हुए जहर को महीनों तक अपने पास नहीं रखेगा। पुलिस के आने और उसे उससे बरामद करने का इंतजार नहीं करेगा।
ऐसे व्यक्ति का स्वाभाविक आचरण यह होता है कि वह अपने शिकार को जहर देने के बाद बचे हुए जहर को फेंककर सबूत नष्ट कर देता है। इन टिप्पणियों के साथ खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए दोषसिद्धि के फैसले को रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के अनुरूप नहीं पाया। इन दलीलों के साथ ट्रायल कोर्ट का फैसला खारिज कर दिया।