पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का दिल ताउम्र कश्मीर के लिए धड़कता रहा। जम्मू कश्मीर के वर्तमान स्वरूप को उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के एक निशान, एक विधान की मुहिम का हिस्सा थे। वाजपेयी पत्रकार के रूप में तत्कालीन भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ 1950 में उस अभियान में शामिल रहे जिसके तहत बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश के लिए संघर्ष हुआ था। तब दूसरे राज्यों के लोगों के कश्मीर में प्रवेश के लिए विशेष परमिट लेने का प्रवाधान था। मुखर्जी ने उस प्रवाधान को खत्म करने के लिए आंदोलन के तहत बिना परमिट प्रवेश किया था। बाद में यही मुद्दा अटल बिहारी को सियासत में खींच लाया।
जब वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो कश्मीरियों का दर्द बांटकर समाधान खोजने की कोशिश की। पाकिस्तान के बेहतर रिश्ते और कश्मीरियों की खुशहाली उनके फार्मूले का अहम हिस्सा था। वह कश्मीर समस्या के समाधान के करीब पहुंच गए थे लेकिन हालात ऐसे बने कि वह हकीकत में नहीं बदल पाया।
वाजपेयी एकलौते सियासतदां रहे जिन्हें कश्मीर का हर तबका दिलोजान से चाहता रहा। चाहे अलगाववादी हों या मुफ्ती मोहम्मद या फिर फारूक अब्दुल्ला, सब वाजपेयी के मुरीद रहे हैं। वाजेपयी के श्रीनगर दौरे को याद करते वक्त मुफ्ती मोहम्मद सईद की आंखें नम हो जाती थीं और गला रुंघ जाता था। निधन से कुछ ही दिन पहले मुफ्ती ने इस संवाददाता से कहा था कि तब 2003 में श्रीनगर में अटल जी की बड़ी जनसभा हुई थी। भाषण से पहले आसमान में छाए काले बादल छंटने लगे और वाजपेयी ने इसका जिक्र कश्मीर पर छाए संकट के बादल छंटने के रूप में किया था।
तब अटल ने कहा था कि हम लोगों का दुख-दर्द बांटने आए हैं। हमारे दिलों के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे। तब उनके इस बयान ने ही ज़ादू का काम किया था और कश्मीर में अमन बहाली को गति मिली थी। वाजपेयी के ही शासनकाल में अलगाववादी वार्ता की मेज तक आए।
वाजपेयी फार्मूला आज भी स्वीकार्य
वह अटल का करिश्मा ही था जो अलगाववादियों को संविधान के दायरे में बातचीत के लिए सहमत कर पाया। वाजपेयी के प्रति विश्वास ही था कि अलगाववादी नेताओं ने तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से मुलाकात की और कश्मीर में हालात सामान्य हुए। कश्मीर में अमन के लिए इंसानियत, जम्हूरियत और और कश्मीरियत का वाजपेयी का फार्मूला अब भी सभी पक्षों को स्वीकार्य है।
मुखर्जी की मौत को साजिशन हत्या मानते थे अटल
श्याम प्रसाद मुखर्जी
- फोटो : फाइल
वाजपेयी ने कई मंचों से श्याम प्रसाद मुखर्जी की मौत का मुद्दा उठाया था। वह इसे साजिश के तहत की गई हत्या मानते थे। वाजपेयी पत्रकार के रूप में मुखर्जी के उस अभियान में शामिल थे जिसके तहत बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश के लिए संघर्ष हुआ था। कश्मीर में प्रवेश के लिए दूसरे राज्य के लोंगों के लिए परमिट लेने की व्यवस्था का मुखर्जी ने विरोध किया और राज्य में बिना परमिट प्रवेश किया था। मुखर्जी को श्रीनगर में गिरफ्तार किया गया। बाद में उनकी मौत हो गई। वाजपेयी ने कई मौकों पर केंद्र में तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू और रियासत में शेख अब्दुल्ला की सरकार को साजिश रचने के मुद्दे पर घेरा।
श्रीनगर की गुडफ्राइडे स्पीच
अटल बिहारी वाजपेयी श्रीनगर में रैली को संबोधित करते हुए...
- फोटो : फाइल
मुफ्ती मोहम्मद सईद के मुख्यमंत्रित्वकाल में जब 18 अप्रैल 2003 को वाजपेयी श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में प्रधानमंत्री पहुंचे तब भारी भीड़ जमा हुई थी। वाजपेयी जब स्टेडियम पहुंचे, वहां पास के एक चर्च की घंटी बज उठी। वाजपेयी ने जब संबोधन किया तो कश्मीर में बदलाव और भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर उनकी बात लोगों को दिलों तक पहुंची। उस स्पीच को आज भी लोग याद करते हैं। उस स्पीच को गुड फ्राइडे स्पीच के नाम से जाना जाता है।
स्व शासन के पक्षधर थे अटल
वाजपेयी ने कहा था कि हम मित्र बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं। इसी सिद्धांत के तहत उन्होंने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश की। वह कश्मीर की आजादी की मांग के विरोधी थे लेकिन स्व शासन के तहत आम कश्मीरियों को सत्ता में भागीदार बनाना चाहते थे। कश्मीर समस्या के समाधान के लिए उन्होंने चार सूत्री फार्मूला तैयार किया था। इसके तहत एलओसी पर दोनों ओर से सेना हटाने, एलओसी को अंतरराष्ट्रीय सीमा घोषित करने, कश्मीर में आजादी नहीं स्व शासन की बहाली और सभी पक्षों को मिलाकर एक सुपरवाइजिंग मैकेनिज्म तैयार करना की सूत्र इसमें शुमार था।