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कश्मीर बस सेवा: 'हम जा रहे हैं अपने वतन'

Sat, 25 Oct 2014 12:18 AM IST
शुमैला जाफ़री/बीबीसी संवाददाता
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मुज़फ़्फ़राबाद के बस टर्मिनल पर श्रीनगर जाने वाली बस रवानगी के लिए तैयार है। हाथों में बड़ा सा एक बैग उठाए एक बुजुर्ग बस टर्मिनल में दाख़िल हुए। चेहरे पर दाढ़ी, बादामी रंग की सलवार कमीज, कंधे पर रुमाल और सिर पर नमाज़ पढ़ने वाली टोपी। इनके साथ एक महिला और दो बच्ची भी है।
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यह 73 साल के नूर हुसैन हैं जो अपने सात बहन भाइयों से मिलने श्रीनगर जा रहे हैं। इनके चेहरे से छलकती खुशी देखी जा सकती है। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया, 'हम जा रहे हैं अपने वतन।' मैंने पूछा कहां जा रहे हैं आप लोग।वे कहते हैं, 'मेरी पैदाइश बारामूला की है। एक भाई बारामूला में रहता है और छह बहन भाई श्रीनगर में हैं।'

दोनों देशों में है अविश्वास का माहौल

पाकिस्तान की कशिश 1958 में नूर हुसैन को मुज़फ्फ़राबाद खींच लाई। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि वे 55 बरस में सिर्फ़ दो बार ही अपने परिवार से मिल सकेंगे। वो भी इस बस सर्विस की वजह से।

नूर कहते हैं, 'कश्मीर और पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरियों के लिए यह छोटा सा एक आसरा है। उनके लिए यह एक अकेला ज़रिया है अपनों से मिलने का। हम तो कहते हैं कि इसको जारी रहना चाहिए। कितनी भी तल्ख़ी बढ़ जाए, इस बस को बंद नहीं होना चाहिए।'

नूर हुसैन की तरह बहुत से कश्मीरियों की यही ख़्वाहिश है। लेकिन हाल ही में दोनों मुल्कों के बीच तनाव की स्थिति ने अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है। आमतौर पर इस बस में 60 के क़रीब मुसाफ़िर सफ़र करते हैं लेकिन आज इनकी संख्या 20 है।

कैसी होती सीमा पर सामान की जांच

बस मुजफ़्फराबाद के टर्मिनल से चकोठी सीमा चौकी पर पहुंचती है जहां मुसाफिरों के कागज़ात देखे जाते हैं और उनके सामान की जाँच की जाती है। इसके बाद बस भारत की ओर रवाना हो जाती है।

चकोठी की सीमा चौकी पर जड़ी बूटियों और कश्मीरी कालीनों से लदे ट्रकों की कतार देखी जा सकती है जो हाल के तनाव के बावजूद अभी तक जारी है।

सूखे मेवे, जड़ी बूटी, कश्मीरी कालीन और कपड़े से लदे ट्रकों को भारत भेजने से पहले सभी सामान को निकालकर और बोरे को खोलकर उसकी जाँच की जाती है। ऐसा इसलिए, ताकि कोई प्रतिबंधित वस्तु एक जगह से दूसरी जगह न जा सके।

दोनों देशों के बीच मौजूदा समझौते के अनुसार इस रास्ते से 21 ऐसा सामान हैं जिनका कारोबार किया जा सकता है। इस व्यापार पर कोई टैक्स नहीं है और व्यापारियों से लेकर ट्रक ड्राइवरों तक हर किसी का कश्मीरी होना ज़रूरी है।

जान‌िए लोगों के सीमा पर क‌िन परेशानी का समाना करना पड़ता है

शब्बीर अहमद वर्ष 2008 से सूखे मेवा और कपड़ा मुज़फ़्फ़राबाद से श्रीनगर भिजवा रहे हैं। वह इस बार माल सीमा पार भेजते हुए परेशान हैं।

वे कहते हैं, 'इधर के कश्मीर की पूरी अर्थव्यवस्था इसी व्यापार पर चलती है। मजदूर हैं, ड्राइवर हैं, व्यापारी हैं। सभी लोगों का रोजगार इससे जुड़ा है। यह कश्मीर से कश्मीर का कारोबार है। लेकिन इस बार यह व्यापार बंद हुआ तो हमारा सारा पैसा फंस जाएगा और हम फिर हम दोबारा पैसा नहीं लगा सकेंगे।'

शब्बीर अहमद की परेशानी का कारण भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली हालिया गोलीबारी है। बीते कुछ हफ़्तों में लगभग 20 लोग इसी गोलीबारी में अपनी जान गंवा चुके हैं। चकोठी की चौकी से मीलों दूर नकयाल सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर एक और ही दृश्य है। शाम ढले गांव डबसी नाड़ की रहने वाली ज़हीन अख्तर अपने आंगन में खाना पकाने में व्यस्त हैं।

यह गांव भारतीय सीमा से महज कुछ 100 मीटर की दूरी पर है। कुछ दिन पहले वह इसी तरह अपने बच्चों को खाना खिला रही थी कि भारतीय गोलीबारी शुरू हो गई जिसमें उनके चार बच्चे घायल हो गए।
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गोलीबारी की चपेट में

इनमें तीन वर्षीय समीर शामिल है। इस क्षेत्र से कई परिवार पलायन कर चुके हैं लेकिन ज़हीन जैसे लोगों का कोई ठिकाना नहीं है।

वे कहती हैं, 'हम कहां जाएं। हमारी ज़मीनें यहाँ हैं। घर यहाँ हैं। हम डरे हुए हैं। ज़रा सी आवाज आती है तो हम सहम जाते हैं। अपने बच्चों को इकट्ठा करके अंदर ले जाते हैं।

न पानी ला सकते हैं। न फसलें काट सकते हैं और न ही बच्चों को स्कूल भेज सकते हैं। दुश्मन सामने है। जब दिल करता है फ़ायर खोल देता है।'

शायद ऐसी ही स्थिति सीमा की दूसरी ओर भी है। जहां नियंत्रण रेखा के करीब रहने वाले गोलीबारी की चपेट में हैं। विश्लेषकों के मुताबिक दोनों सरकारों ने बस सेवा और कारोबार जैसे भरोसा बनाने वाले उपायों को जारी रखकर समझदारी दिखाई है।
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