कारगिल युद्ध के दौरान मिली सीख और उस समय की गई सैन्य तैयारियों का फायदा 21 साल बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गलवां संघर्ष के दौरान मिला है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 1999 के कारगिल युद्ध के बाद एलओसी व एलएसी पर सेना ने भारी तैयारियां की थीं। पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि चीन के साथ लगती सीमा पर भी जवानों की पर्याप्त संख्या में तैनाती के साथ ही तीनों सेनाओं में सामरिक महत्व के प्रबंध भी किए गए थे। इसी के तहत 14 कोर (फायर एंड फ्यूरी) अस्तित्व में आई।
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक पहले द्रास में एक बटालियन होती थी। बाद में यह ब्रिगेड बन गई। इसी प्रकार लेह में एक डिवीजन थी। कारगिल युद्ध के बाद यहां 14 कोर का गठन कर सैन्य तैनाती बढ़ाई गई। इसी कोर के जिम्मे लेह, कारगिल के साथ ही पूरी एलएसी पर सुरक्षा का जिम्मा है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) राकेश शर्मा का कहना है कि कारगिल की खामियां और सीख आज गलवां में हमें मजबूत स्थिति में रखे हुए हैं। भारतीय सेना का हाई एल्टीट्यूड वारफेयर में पारंगत होना कारगिल की ही देन है। कारगिल में खुफिया तंत्र की नाकामियों में भी सुधार किया गया। यही वजह है कि गलवां में चार-पांच दिन के भीतर ही चीन की नापाक हरकतों को पता चल गया।
शर्मा कहते हैं कि इंटीग्रेटेड ज्वाइंट रिस्पांस में कारगिल युद्ध के दौरान देरी हुई थी। इसके बाद ही सीडीएस की नियुक्ति का सुझाव आया था, जो अब पूरा हो गया है। यही वजह है कि गलवां के दौरान तीनों सेनाओं की पूरी तैयारी दिखी। कारगिल में मिली सीख की ही नतीजा है कि लद्दाख के लिए रोहतांग के रास्ते का विकल्प तैयार किया गया ताकि केवल जोजिला ही नहीं बल्कि रोहतांग से भी सप्लाई लाइन बहाल रह सके।
कर्नल (रिटायर्ड) एसएस पठानिया का कहना है कि कारगिल युद्ध के बाद लद्दाख में हमारी सैन्य ताकत बढ़ी है। पूरी एलएसी पर हम मजबूत स्थिति में हैं। हाल ही में गलवां में हुए संघर्ष में भारत ने जो दम-खम दिखाया है, वह इन्हीं सब तैयारियों तथा सेना के ऊंचे मनोबल का प्रतिफल है। हमारी खुफिया ताकत बढ़ी है। फायर एंड फ्यूरी कोर का गठन किया गया। पूरी एलएसी पर हमारी स्थिति मजबूत हुई है।