धैर्य और साहस के इम्तिहान में जम्मू पास हो गया। सबने बखूबी जिम्मेदारी निभाई। ऑपरेशन सिंदूर से लेकर सीजफायर के एलान तक डर को समझदारी से जीत लिया, एक दूसरे का हौसला बढ़ाया। पर ये शहर पाकिस्तान की नीयत पर भरोसा न करने की सलाह दे रहा है।
चार दिन तक चले ऑपरेशन सिंदूर पर 10 मई की शाम को संघर्ष विराम की घोषणा के साथ विराम लग गया। ये चार दिन जम्मू-कश्मीर ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए बहुत अहम थे। इस चुनौती के वक्त ने हर किसी ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
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जम्मू और यहां के लोग भी चुनौतीपूर्ण हालात में डटे रहे और युद्ध जैसे हालात में हर इम्तिहान में पास हुए।आगे हालात जैसे भी हों, एक बार फिर से यह तो तय हो गया कि इस शहर का शांत स्वभाव ही इसकी ताकत है।
इतना ही नहीं, जिस तरह से शनिवार की शाम सीजफायर का एलान हुआ, उसने लोगों को हतप्रभ भी किया। मिली-जुली प्रतिक्रियाओं ने ये भी जता दिया कि युद्ध ठीक नहीं, लेकिन जब देश की बात हो, जम्मू-कश्मीर की बात हो तो हर घर का बच्चा मैदान में खड़ा रहेगा।
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शनिवार की रात बीते तीन दिनों की अपेक्षा शांत थी, पर एक आशंका में लोगों की आंखों से नींद दूर थी। फर्क बस इतना था कि कोई धमाका नहीं था, लोगों ने पूरी रात स्वघोषित ब्लैकआउट में बिताया। लोगों के यहां लाइटें तभी जलीं, जब सुबह हुई।
प्लौड़ा निवासी सोनल कहती हैं कि डरता कोई अपने लिए नहीं, बल्कि घर के बड़े-बुजुर्गों-बच्चों के लिए है। उन जवानों के लिए डर लगता है जो बाॅर्डर पर रहते हैं। देखिए न सीजफायर तो हुआ, पर आज ही खबर है कि हमारी सेना व बीएसएफ के दो अफसर समेत चार लोग बलिदान हो गए।
बस इसी सोच ने चार दिन को थोड़ा सा मुश्किल कर दिया। पुंछ में हालात बिगड़े तो हमारे ससुर विद्या सागर को हम लोगों ने जम्मू शिफ्ट किया। उनके आने के बाद हमारा वक्त बीते समय में हुई जंग के किस्सों के बीच बीत गया।
'पाकिस्तान को सबक सीखाना जरूरी था'
चट्ठा में रहने वाले डॉ. अली हसन कहते हैं कि हमारे लिए तो रोमांच से भरे थे ये चार दिन। जंग नहीं चाहते, पर पाकिस्तान को सबक सीखाना जरूरी था। उस पर यकीन कतई नहीं करना चाहिए। बाजार बंद रहने को डर नहीं कहना चाहिए, ये सतर्कता भी थी कि चारों तरफ से, बीच शहर में गोलाबारी की खबरों के बीच घर में सुरक्षित रहना समझदारी थी, न कि कायरता।
यह इस शहर की ताकत ही तो है कि शनिवार को शहर में गोले दागे जाते हैं, एक की मौत होती है, पांच घायल होते हैं। मौत दुखद है पर रविवार की सुबह से ही शहर अपनी रौ में बहता दिख रहा है। मानो, पाकिस्तान को जता रहा हो कि हमारी शांति कोई नहीं छीन सकता।
'मौत से कैसा डर, वह तो कहीं भी आ जाएगी'
त्रिकुटानगर गुरुद्वारे में मत्था टेकने पहुंचीं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. देविंदर कौर कहती हैं कि हमारा जम्मू हो या कश्मीर चारों तरफ सीमावर्ती इलाकों में लोग हर दिन गोलियों की आवाजें सुनकर सोते और जागते हैं। बाहर के शहरों से लोग फोन करके हमसे यही सवाल कर रहे थे कि आप लोग जम्मू से बाहर चले जाओ। मैं उनसे यही कहती कि मौत तो घर के अंदर आ जाएगी।
जंग के वक्त तो अपनों के बीच रहना चाहिए। हम त्रिकुटानगर के लोगों ने यह तय किया कि हम लोग कहीं नहीं जाएंगे। जरूरत पड़ेगी तो एक दूसरे का सहारा बनेगा। हां, लोगों को हमने देखा कि दुकानों पर सामान लेने के लिए भीड़ लगाए हैं, पर जम्मू के किसी कोने से भगदड़, अफरातफरी और चीजों के लिए मारामारी की खबर नहीं मिली।