हिल काका एलओसी के पास सटा हुए एक गांव है
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जम्मू कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ अब तक सबसे बड़े आपरेशन सर्प विनाश में शामिल होने वाले हिल काका के लोग उन दिनों को याद कर सहम जाते हैं। लाइन आफ कंट्रोल से सूरनकोट के मार्फत कश्मीर घाटी में प्रवेश करने वाले आतंकियों के लिए हिल काका गांव किसी जन्नत से कम नहीं रहा।
सात सौ से ज्यादा आतंकियों ने इस स्थान पर न सिर्फ महिलाओं के साथ गलत व्यवहार किया, बल्कि उन्हें जिहाद में शामिल होने के लिए कई तरह के प्रलोभन भी दिए, लेकिन उन्होंने उनका साथ नहीं दिया।
यही कारण है कि 17 अप्रैल 2003 को आतंकियों के खिलाफ शुरू हुए अभियान में सेना के साथ गुज्जरों ने भाग लिया और कई आतंकियों को मार गिराया। गुज्जरों के आगे आने के कारण आतंकी हिल काका छोड़ कर भागने के लिए मजबूर हो गए।
आतंकियों ने उन्हें लाखों का आफर दिया था
बार्डर सुरंग
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इस अभियान में जान गंवाने वाले गुज्जर हाजी मोहम्मद आरिफ के भाई ताहिर चौधरी कहते हैं कि आतंकियों ने उन्हें लाखों का आफर दिया था, क्योंकि एलओसी से घुसपैठ करने के बाद उन्हें मुगल रोड के मार्फत कश्मीर घाटी में जाने में मदद मिलती थी।
26 जनवरी 2003 को अभियान शुरू किया जाना था, लेकिन सेना को पता चला कि हिल काका में सात सौ से ज्यादा आतंकी मौजूद हैं। इसी कारण वह और गांव वाले एक माह तीन दिन तक जंगलों में रहे।
उसके बाद संगठित होकर गुज्जरों ने 17 अप्रैल 2003 को आतंकियों पर हमला कर दिया। 27 मई तक वह आतंकियों से लड़ते रहे। यही कारण है कि कश्मीर के अलगाववादी उन्हें पसंद नहीं करते।
200 आतंकियों को मरवाने में अहम भूमिका अदा करने वाले हिल काका के लोग सुविधाओं से वंचित
सेना और आतंकियों में मुठभेड़
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ताहिर कहते हैं कि तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज को दो आतंकियों के शव भेंट किए थे। आतंकियों को भगाने के कारण उन्होंने कई आश्वासन दिए थे। इनमें से गुज्जर युवकों को सेना में भर्ती कर रोजगार दिलाने और सूरनकोट से काका हिल तक सड़क बनवाना शामिल था।
तत्कालीन गृह सचिव आईडी स्वामी ने उनसे वादा किया था। युवाओं को सेना में शामिल तो किया गया, लेकिन 13 साल बाद भी सड़क का निर्माण नहीं करवाया गया। वह गृह मंत्री राजनाथ सिंह से भी मिले, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।
उन्हें इस बात का मलाल है कि दो सौ से ज्यादा आतंकियों को मरवाने में अहम भूमिका अदा करने वाले हिल काका के लोग आज भी ही सुविधाओं से वंचित हैं।