विधानसभा के तीन पूर्व अध्यक्षों द्वारा गैरकानूनी ढंग से की गई 37 नियुक्तियों के लगे आरोप के मामले में स्टेट विजिलेंस आर्गनाइजेशन की ढिलाई पर हाईकोर्ट ने असंतोष व्यक्त किया है।
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस ताशी राबस्तन ने विजिलेंस की ओर से अदालत में उपस्थित एएजी पीसी शर्मा से कहा कि छह जुलाई 2015 को स्टेटस रिपोर्ट फाइल करने के बाद उन्होने क्या कदम उठाए।
साथ ही एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) अदालत में पेश करने के निर्देश दिए। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता प्रो. एसके भल्ला ने आरोप लगाया कि पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद अकबर लोन ने 28, ताराचंद ने पांच और मुबारक गुल ने दो नियुक्तियां (कुल 37 नियुक्तियां) की थीं।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि तत्कालीन अध्यक्षों और विधानसभा सचिव मोहम्मद रमजान के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के विजिलेंस को निर्देश दिए जाएं।याचिकाकर्ता के अपील ने कोर्ट का ध्यान अदालत द्वारा 16 अप्रैल 2015 को जारी आदेश की ओर दिलाया, जिसमें विजिलेंस की क्लोजर रिपोर्ट पर असहमति जताई थी और मामले की प्रारंभिक जांच में दो बिंदुओं को रखा था।
37 पदों पर नियुक्तियों का हिसाब मांगा
इनमें किस ढंग से सभी 37 पदों पर नियुक्तियां हुईं और दूसरा उक्त पदों की भर्ती के लिए लागू होने वाले नियमों का पालना किया गया या नहीं।
एडवोकेट ने कहा कि छह जुलाई 2015 को पूर्व तीन अध्यक्षों ने विधानसभा सचिवालय में 37 नियुक्तियों में गैरकानूनी ढंग से पिछले दरवाजे का इस्तेमाल किया।
लेकिन तीनों आरोपियों की ऊंची पहुंच होने के कारण छह जुलाई के बाद विजिलेंस ने मामले में कुछ नहीं किया और केस की फाइलें अभी भी विजिलेंस कार्यालय में धूल फांक रहीं हैं। एडवोकेट ने कहा कि भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत विजिलेंस को तत्काल अधिनियम की धारा 5(2) के तहत केस दर्ज करना चाहिए।
मामले को लटकाने के लिए विजिलेंस का तर्क है कि अभी रिकार्ड सीज किया जाना है, जो वैध तर्क नहीं है। विजिलेंस से यह पूछा जाना चाहिए कि जुलाई में प्रारंभिक जांच पूरी होने के बावजूद क्या कदम उठाए गए।
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला भी दिया, जिसमें कहा गया है कि सात दिनो में प्रारंभिक जांच पूरी होनी चाहिए और उसके तत्काल बाद आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में देर नहीं की जाए।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक्शन लिया जाना चाहिए, जो एफआईआर दर्ज नहीं करते। वकील ने कहा कि जांच जुलाई के पहले सप्ताह में पूरी हो चुकी थी। चार माह बीत जाने के बावजूद विजिलेंस ने एफआईआर के लिए कोई कदम नहीं उठाया।
असिस्टेंट इंजीनियर सहित दो को एक साल की सजा
हजारों रुपये के सरकारी स्क्रैप का घोटाला करने के आरोप में फंसे गैरिसन इंजीनियर विंग के असिस्टेंट इंजीनियर ओपी भाटिया और सुपरवाइजर भोलानाथ को भ्रष्टाचार निरोधक विशेष जज (सीबीआई) विनोद चटर्जी कौल ने एक-एक साल की कठोर सजा सुनाई है।
इसके अलावा दो मुलाजिम रूप सिंह और आत्मा सिंह को अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। आरोप है कि उन्होंने 13,988.7 किलोग्राम आयरन, 29 किलोग्राम कापर और दो किलोग्राम ब्रास स्क्रैप खुदबुर्द किया।
सीबीआई केस के अनुसार 31 जुलाई 1997 को सूत्रों से जानकारी मिली कि आरोपी ओपी भाटिया, भोलानाथ, रूप सिंह, आत्मा सिंह और अन्य अधिकारियों ने जीई राजोरी में कार्य के दौरान लगभग 73,043 रुपये का स्क्रैप का घोटाला किया।
सीबीआई ने जांच के बाद अदालत में चालान पेश किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि सीबीआई ओपी भाटिया और भोलानाथ के खिलाफ आरोप सिद्ध करने में सफल रही।
अदालत ने दोनों को एक-एक साल की सजा सुनाने के अलावा 30-30 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया। फैसला सुनाते हुए जज ने सीबीआई जांच अधिकारी की जांच पर असंतोष जताया।
अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने गंभीरता से जांच नहीं की और सीबीआई को आदेश दिया कि अफसर के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जाए।