अगर रियासत और दिल्ली की सरकारों ने राज्य के बाढ़ नियंत्रण मंत्रालय द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में न डाला होता तो बाढ़ से आई मौजूदा तबाही को टाला जा सकता था। यह तबाही अचानक नहीं आई। इसका आना तय था।
अमर उजाला ने 10 फरवरी 2010 को प्रथम पेज पर- सैलाब के मुहाने पर खड़ी है रियासत-शीर्षक से खबर छापकर इससे आगाह भी किया था।
उस समय राज्य सरकार के बाढ़ नियंत्रण मंत्री ताज मोहिउद्दीन द्वारा एक ट्रक में भरकर केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया था कि झेलम नदी अगले पांच सालों में कभी भी डेढ़ लाख क्यूसेक पानी उगल सकती है।
ठंडे बस्ते में पड़ी हैं ज्यादातर परियोजनाएं
इस बाबत तत्कालीन प्रधानमंत्री से भी बात की गई थी। सिल्ट से भर चुके इसके इकलौते फ्लड चैनल की सफाई के लिए भी 500 करोड़ रुपए की फौरी मांग की गई थी। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय को भेजी हई 2200 करोड़ की परियोजना भी अभी तक फाइलों में ही है।
फ्लड प्रोन माने जाने वाले कश्मीर में हर 50-55 साल बाद भीषण बाढ़ आती है। पिछली बार 1959 में और उससे पहले 1902 में ऐसी ही बाढ़ आई थी। इस हकीकत से वाकिफ होने के बाद भी रियासत में काबिज रही सरकारों ने तबाही को रोकने के इंतजाम नहीं किए।
केंद्र भी आंखें बंद किए रहा। नतीजा सामने है। यही हाल रहा तो 50 साल बाद फिर महाविनाश तय है। पूर्व बाढ़ नियंत्रण और मौजूदा स्वास्थ्य एवं मेडिकल एजूकेशन मंत्री ताज मोहिउद्दीन का कहना है कि कश्मीर में बाढ़ का खतरा अब भी बरकरार है।
केन्द्र को सौंपा गया था 2200 करोड़ का प्रोजेक्ट
अगली बाढ़ हालिया बाढ़ से भीषण होगी। ताज ने बताया कि उन्होंने चार साल पूर्व बतौर बाढ़ नियंत्रण मंत्री केंद्र सरकार को 2200 करोड़ का प्रोजेक्ट कश्मीर में झेलम नदी से बाढ़ के खतरे को भांपते हुए नियंत्रण के लिए सौंपा था।
उनके बाद विभागीय इंजीनियरों और आला अफसरों ने इस प्रोजेक्ट के लिए पैरवी नहीं की। इन तथ्यों से साफ है कि कुदरत का कहर अकारण या अचानक नहीं टूटा। सरकारों को मालूम था कि ऐसा होगा, फिर भी वे हाथ पर हाथ धरे तबाही का इंतजार करती रहीं।