तीस वर्षीय जावेद बचपन से ही शिकारा चलाता रहा है। पूर्वजों का यह धंधा ऐसा मंदा पहले कभी नहीं पड़ा। सैलाब गुजर जाने के बाद से एक सप्ताह से ज्यादा निकल गया है लेकिन उसे अधैले की आमदनी भी नहीं हुई।
वह पहले की तरह ही रोज ठीक सुबह छह बजे डल लेक के नेहरू पार्क के सामने शिकारा खड़ा कर सैलानियों की इंतजार करता है लेकिन देर शाम निराश ही घर लौटना पड़ता है।
घर में इंतजार करती बीबी चेहरा देखकर ही भांप जाती है कि आज भी कमाई नहीं हुई। डल लेक से करीब दो लाख से अधिक लोगों की जिंदगी जुड़ी है। लेक ही उनके लिए सब कुछ है।
दहशत के चलते घरों में नहीं जा रहे लोग
हाउसबोट के पीछे उनके लकड़ी और सीमेंट के मकान हैं, जो अब उजड़ चुके हैं। सीमेंट से बने मकानों की दीवारें गिर रही हैं। कहीं प्लास्टर उतर गया है और किसी घर की छत ही धंस चुकी है।
जान की जोखिम के कारण इन लोगों ने अपने घर छोड़ दिए हैं। कुछ ने नेहरू पार्क के पास के सरकारी कैफेटेरिया में शरण ली है और कुछ रिश्तेदारों के घर चले गए हैं।
सैलाब के बाद शंकराचार्य मंदिर की पहाड़ियां भी शरणगाह बनी थीं। अब गवर्नर हाउस के पास वाले मैदान में लगे टेंटों में भी दर्जनों लोगों ने शरण ली है। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें घर का मोह जगह छोड़ने की इजाजत नहीं देता।
जनता का राहत सामान हड़प रहे मुलाजिम
शिकारा से डल लेक में हाउसबोट के पीछे वाले इलाके में तबाही ज्यादा दिखती है। मोहम्मद असगर कहते हैं अबी तक कोई रिलीफ नहीं मिला है। डल लेक के लिए चार ट्रक सामान आया था जिसमें से दो ट्रक मुलाजिमों के पास ही रह गया।
दो ट्रक का सामान बंटा लेकिन मांग ज्यादा थीं और माल कम। अधिकांश पीड़ित राहत से वंचित रह गए। चालीस वर्षीय सज्जाद हो या सत्तर साल के अब्दुल खालिद, अधिकांश पीड़ितों को मोदी सरकार पर ज्यादा भरोसा है।
वह कहते हैं कि मोदी से उम्मीद है। वह जैसा बोल रहे हैं उससे लगता है कि मदद जरूर मिलेगी। रियासत सरकार के महकमे में ऐसे लोग भी हैं जो राहत का समान खुद डकार जाएंगे।
सीआरपीएफ नहीं करती भेदभाव
जब तक सेना और सीआरपीएफ के जवानों ने मदद की, तब तक ठीक था। अब पता ही नहीं चलता कि बाहर से आने वाला राहत का सामान कहां जा रहा है। डल लेक की बस्ती में शौकत अहमद मीर ने पनाह ली है।
वह डल लेक गेट इलाके में था जब उनका मकान गिर गया। चार दिन तक पूरा परिवार शिकारे में रहा। खाने को लाले पड़े थे। अपनी मां रफीका, बहन साइमा, और दादी के साथ वह रिश्तेदार के घर में पनाह लिए हुए हैं।
पीड़ित शौकत कहते हैं कि सीआरपीएफ जरूरतमंदों में भेदभाव नहीं करती। पुलिस वाले राहत का सामान खुद ही ले जाते हैं। डल लेक के अंदर की बस्तियों में अंधेरा है। बिजली जब तक नहीं आती, तब तक लालटेन के लिए मिट्टी का तेल मिलना जरूरी है।
डल लेक के मीना बाजार के पीछे वाले हिस्से में लगभग 300 परिवारों की बस्ती है। यहां रहने वाली महिला बटपुर कहती है कि वह रोज राहत सामानों की बाट जोहती है लेकिन निराशा ही हाथ आती है। मोहम्मद शैफी सुगू, हबीबुल्लाह सुगू का भी दर्द एक जैसा ही है।