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डल झील में अब शायद ही दिखें हाउस बोट के 'वो' नजारे

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तबाही के बाद पटरी पर लौटने के लिए बेताब जिन्दगी के सामने बाधाओं के पहाड़ खड़े हैं। हमेशा गुलजार रहने वाली डल खामोश और उदास है। घाट पर सैलानियों का रेला नहीं दिखता। टूटे शिकारे और नाविक आदतन पर्यटकों की राह देखते हैं लेकिन इंतजार में आंखें पथरा जाती हैं।
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किनारे की पटरियों पर हर वक्त भीड़ रहती थी, वह दृश्य सैलाब अपने साथ बहा ले गया। हाउसबोटों के अंदर-बाहर मायूसी पसरी है। तबाही गुजर गई, जख्म बाकी रह गए। तहस नहस होकर बंद पड़े एक हजार से ज्यादा हाउसबोट फिर से आबाद होने को बेताब हैं।

हाउसबोट रायल गौरी हाउसबोट के मालिक अब्दुल खालिद गासी कहते हैं कि सैलाब सब कुछ बहा ले गया। कश्मीर 50 साल पीछे चला गया। हाउसबोट पर फिर से पर्यटकों की हलचल शुरू करने की ख्वाहिश है लेकिन रास्ता नहीं दिखता।
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कभी थे करोड़पति, अब तन ढकने को कपड़े नहीं

खालिद हाउसबोट के अंदर का एक-एक कमरा दिखाते हैं। चार कमरे अब कूड़े के ढेर में तब्दील हो गए हैं। सारी जमा पूंजी सैलाब अपने साथ ले गया और अब आमदनी शून्य हो गई है। पहनने के लिए कपड़े तक नहीं बचे।

हाउसबोट के कमरों के सभी टीवी सेट, सोफा, फर्नीचर, परदे, आलमारी, कालीन सब कुछ बरबाद हो गया है। रिश्तेदारों से पुराने कपड़े मांगकर पूरा परिवार तन ढंकने को मजबूर हुआ है। तबाही के बावजूद 70 साल की उमर में भी हौसला नहीं टूटा है।

खालिद कहते हैं कि सरकारी मदद का शोर ज्यादा है लेकिन हकीकत में कुछ नहीं मिला। बैंक लोन के लिए कागजात तक नहीं हाउसबोट की मरम्मत के लिए अब बैंक से लोन की जरुरत होगी। उसके लिए कागजात तक नहीं बचे हैं।

80 लाख से डेढ़ करोड़ के हाउसबोट बरबाद

राशन कार्ड और वोटर कार्ड भी नहीं है। बैंकों और सरकारी महकमों को दस्तावेज चाहिए। जमानतदार भी बनाएं तो किसको खोजें। सगे-संबंधियों का भी एक जैसा ही हाल है।

पुराने हाउसबोट की कीमत 80 लाख और नये की लगभग डेढ़ करोड़ की आंकी जाती है। कई हाउसबोटों का बीमा भी नहीं है। उन्हें बीमा मुआवजा भी नहीं मिल सकता। सरकारी मदद के नाम पर अब तक पुलिस का एक सर्वे हुआ है।

महज आंकड़ों की खेती हो रही है। सरकार का कोई भी आदमी यहां नहीं आया है। जब सैलाब था तब सेना और सीआरपीएफ के जवानों ने काफी मदद की थी। अब हाउसबोट फिर से खड़ा करने की चुनौती है।
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आंखों के सामने टुकड़े टुकड़े हुए हाउसबोट

डल लेक गेट की ओर हाउसबोट को ज्यादा नुकसान हुआ है। कुछ हाउसबोट तो टुकड़े -टुकड़े हो गए। एक हिस्सा अपने स्थान के करीब रहा और दूसरा घाट नंबर 11 पर पहुंच गया। क्वीन आफ द लेक के मालिक मोहम्मद शफी खुरू अब तक सैलाब के मंजर को भूल नहीं पाए हैं।

वह कहते हैं कि जब सैलाब आया तो आठ लोग ठहरे थे। पहले तो हाउसबोट पानी-के साथ-साथ ऊपर आता रहा लेकिन जान जाने का खतरा तब भी था।

मेहमान हमारे लिए जान से अधिक कीमती होता है। उनको आर्मी की मदद से बचाया। लेकिन हम यहीं फंसे रह गए। फिर ठंडी आह भरकर कहते हैं कि शायद कुदरत को यही मंजूर था।
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