न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को तय करते हुए निर्देश दिया कि उस दिन यासीन मलिक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश किया जाए।
हाईकोर्ट राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें आतंकी फंडिंग मामले में मलिक की उम्रकैद की सजा को बढ़ाकर मृत्युदंड देने की मांग की गई है। मलिक फिलहाल तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है। उसने पहले अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर एनआईए की याचिका का विरोध करने की इच्छा जताई थी।
जेल प्रशासन ने पहले अदालत से मलिक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश करने की अनुमति मांगी थी। आवेदन में उसे बेहद उच्च जोखिम वाला कैदी बताते हुए सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के मद्देनजर अदालत में शारीरिक रूप से पेश करने से बचने की बात कही गई थी। हाईकोर्ट ने इस अनुरोध को मंजूरी दे दी थी।
2022 में सुनाई गई थी उम्रकैद की सजा
दिल्ली की एक विशेष अदालत ने 24 मई 2022 को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता के तहत दोषी ठहराते हुए यासीन मलिक को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मलिक ने आरोपों को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद एनआईए ने सजा बढ़ाकर मृत्युदंड देने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की।
एनआईए का तर्क है कि केवल दोष स्वीकार करने और मुकदमे का सामना नहीं करने के आधार पर किसी आतंकवादी को मृत्युदंड से बचने का लाभ नहीं मिलना चाहिए। एजेंसी ने यह भी कहा है कि मलिक के कई आतंकी संगठनों और लश्कर-ए-ताइबा के समर्थकों से संबंध रहे हैं।
वहीं, मलिक ने अपने जवाब में दावा किया था कि उसने करीब तीन दशकों तक जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए विभिन्न प्रधानमंत्रियों, खुफिया अधिकारियों और अन्य प्रभावशाली लोगों के साथ अनौपचारिक संवाद प्रक्रिया में भूमिका निभाई थी। विशेष अदालत ने पहले मृत्युदंड की मांग खारिज करते हुए कहा था कि मलिक के अपराध गंभीर हैं और भारत की एकता के लिए चुनौती थे, लेकिन यह मामला मृत्युदंड देने के लिए 'दुर्लभतम से दुर्लभ' श्रेणी में नहीं आता।