ऐतिहासिक राज्य जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में तब्दील करने के बाद केंद्र के सामने घाटी के सियासी शून्य को भरने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। अब तक कश्मीर आधारित सियासी दलों को अलगाववादियों की काट के तौर पर भी देखा जाता था।
नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के अलावा अन्य छोटे दलों के जरिए घाटी से चुनावों में हिस्सेदारी होती रही है। बावजूद इसके कि अलगाववादी खेमा चुनाव बहिष्कार के लिए पत्थरबाजी का सहारा लेता रहा।
घाटी के यह दल एक तरह से देश की मुख्यधारा में शामिल होकर चुनावों में हिस्सा लेते रहे हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की प्रक्रिया के शुरुआत से बने हालात के बीच कम से कम कश्मीर घाटी में सियासी शून्य बन गया है।
जम्मू यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान विभाग की प्रोफेसर एलोरा पुरी के अनुसार जम्मू-कश्मीर में बदले निजाम के सामने घाटी के सियासी शून्य को भरने की चुनौती सबसे बड़ी है।
घाटी में राजनीतिक प्रक्रिया को बिना वक्त गंवाए बहाल करना होगा। जम्मू-कश्मीर को लेकर केंद्र की नीति में कश्मीर पहले से मुख्य केंद्र रहा है। बदले हालात में भी केंद्र सरकार को कश्मीर पर अपनी संवेदनशील नजर बनाए रखनी होगी।
यूटी पर प्रो. एलोरा का कहना है गवर्नेंस भी एक बड़ा मुद्दा है। यह देखना होगा कि कितनी जल्दी केंद्र के प्रतिनिधि स्थानीय अपेक्षाओं और जरूरतों को समझकर अच्छी शासन व्यवस्था दे पाते हैं। जम्मू संभाग में डोगरा पहचान के संकट को लेकर अभी से स्वर उठने लगे हैं।