इससे पहले केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव शालीन काबरा की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि श्रीनगर के उपायुक्त की ओर से 15 सितंबर को डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर लगाए पीएसए और फिर 13 दिसम्बर को इसकी अवधि तीन महीने के लिए बढ़ाए जाने को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। पिछले साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाए जाने से एक दिन पहले ही फारूक अब्दुल्ला को घर में नजरबंद कर दिया गया था।
बता दें कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों डॉ. फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत कई नेताओं को पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। वहीं कल यानी कि शुक्रवार को हुई फारूक अब्दुल्ला की रिहाई से पहले कुछ अन्य नेताओं को भी छोड़ा गया था, लेकिन उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती समेत अभी भी कई नेता नजरबंद हैं।
फारूक अब्दुल्ला से मिलने पहुंचे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि सबसे पहले नजरबंद सभी नेताओं को रिहा किया जाए तब आगे की बातों के बारे में सोचेंगे। जिस राज्य के पूर्व तीन मुख्यमंत्री बंद हो वहां कैसी जम्हूरियत।उन्होंने कहा कि मैं अपने घरेलू रिश्ते और सभी सांसदों की ओर से फारूक अब्दुल्ला से मिलने आया हूं। साथ ही जो कुछ सांसदों द्वारा उनकी रिहाई के लिए प्रयास किए गए हैं उनसे अवगत करवाने आया हूं।
गुलाम नबी आजाद ने कहा कि फारूक अब्दुल्ला को सात महीने से अधिक समय तक घर में नजरबंद रखा गया। हम अभी भी इसके पीछे के कारण को नहीं जानते। आजाद ने कहा कि उन्होंने ऐसा कौन का कार्य किया जिसके लिए उनको नजरबंद रखा गया।
इसके बाद आजाद ने कहा कि मैं दोस्ती के नाते उनसे मिलने के लिए यहां आया हूं। मैं यहां उन सभी सांसदों की तरफ से आया हूं, जिन्होंने फारूक साहब की रिहाई के बारे में बात की थी। गुलाम नबी आजाद ने कहा कि अगर हमें कश्मीर को खुश रखने की जरूरत है तो सभी नेताओं को रिहा करने की जरूरत है और सभी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत है।
इसके बाद उन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि किसी भी विकास परियोजना पर कोई काम नहीं हो रहा है। इतना ही नहीं पर्यटन चला गया, हस्तकला समाप्त हो गई। यहां तक कि जम्मू की हालत भी खराब हो गई है। इसका एक ही उपाय है कि सभी राजनीतिक नेताओं को रिहा किया जाए। साथ ही जम्मू कश्मीर को राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।