मुख्य रूप से पिज्जड के लिए जाने पहचाने जाने वाले थीन वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र में सांभर, बार्किंग डियर के साथ हिमालयन गोडल भी आम तौर पर दिखाई देते हैं। हाल ही में इस वन्यजीव क्षेत्र में वाइट रंपड वल्चर भी देखे गए हैं। सर्वेक्षण में इनके घरौंदे भी देखे गए हैं। देश में इनकी 95 प्रतिशत आबादी खत्म हो चुकी है। आईयूसीएन की लिस्ट में इसे क्रिटिकल इंडेजरड बर्ड के रूप में दर्ज कर दिया गया है। ऐसे में इस क्षेत्र में इनके घोंसलों के साथ-साथ देखे जाने पर उम्मीद की एक नई किरण भी सामने आई है।
थीन गांव से बांध साइट तक होगा ट्रैकिंग रूट
थीन वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र में ट्रैकिंग रूट थीन गांव से शुरू होगा जो रंजीत सागर बांध साइट के नजदीक जाकर खत्म होगा। यह ट्रैकिंग रूट वन्यजीव क्षेत्र के बीचों बीच होकर गुजरेगा।
ट्रैकिंग रूट को लेकर कवायद शुरू की जा रही है। इसे नियमित रूप पर मेंटेन भी किया जाएगा। ट्रैकिंग रूट में रेस्टिंग शेड, प्रोटेक्शन के साथ-साथ व्यू प्वाइंट, बावली आदि को भी प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जाएगा और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। विभाग की कोशिश है कि स्थानीय लोगों को गाइड के तौर पर बढ़ावा दिया जाए। -विजय कुमार वर्मा, वन्यजीव वार्डन, कठुआ
राजा महाराजाओं के समय से वन्यजीव क्षेत्रों को अलग-अलग केटेगरी में परिभाषित किया जाता रहा है। गेम रिजर्व(शिकारगाह के रूप) सरकार ने पहले इस वन्यजीव क्षेत्र को रिजर्व किया था। वर्ष 2002 में संशोधन के बाद इसे संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र घोषित कर दिया गया। थीन वन्यजीव क्षेत्र मुख्य रूप से गोरल (पिज्जड) का प्राकृतिक वास है।