जम्मू। अपने सबसे बड़े पर्व महाशिवरात्रि के साथ कश्मीरी पंडितों का नाता और गहरा गया है। आतंकवाद के चलते विस्थापन के बाद से कश्मीरी पंडितों को पूजा के लिए पुरोहित नहीं मिले तो संस्कृत सीखकर खुद मंत्रोच्चार करना सीख लिया। कश्मीर घाटी में अपने आराध्य को ताजा बर्फ का भोग लगाते थे, लेकिन अब फ्रिज में जमी आइस क्यूब का सहारा लेते हैं।
भगवान शिव के उपासक और शैव परंपरा के वाहक कश्मीरी पंडितों के तीन सप्ताह तक चलने वाले महाशिवरात्रि पर्व पर इस साल भी बहुएं मायके जाएंगी। वहां से धन व समृद्धि की वस्तुओं का शगुन लेकर लौटेंगी। कश्मीरी पंडितों का कहना है कि आतंकवाद ने हालात बदले हैं लेकिन भगवान शिव का दिया हौसला और दृढ़ता वही है। पर्व को लेकर उत्साह में कोई कमी नहीं आई है।
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि वे महाशिवरात्रि को उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस उत्सव के लिए परिवार का यदि कोई सदस्य बाहर है तो वह घर जरूर आता है। वह चाहे कामकाजी हो या फिर पढ़ने वाला। दशमी के दिन बहुएं अपने मायके जाती हैं और वहां से नमक, पैसा, रोटी व कौड़ियां लेकर आती हैं। बहू को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, इस वजह से यह परंपरा निभाई जाती है। कश्मीरी पंडितों का कहना है कि महाशिवरात्रि के बाद कश्मीर में लोग वितस्ता नदी में कलश में स्थापित प्रतिमा का विसर्जन करते थे। पानी काटने की परंपरा निभाई जाती थी। अब वितस्ता नहीं रही। विस्थापन कर लोग जम्मू और अन्य स्थानों पर चले आए। ऐसे में अब नदी नहीं है तो लोग घरों में ही थाली में पानी रखकर उसे काटने की रस्म अदायगी करते हैं।
पूजा के कलश में बर्फ डालने का विधान
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि पूजा के कलश में बर्फ डालने का विधान है। कश्मीर में शिवरात्रि के दौरान चारो ओर बर्फ रहती थी, इस वजह से कोई दिक्कत नहीं होती थी। विस्थापन के बाद बर्फ से नाता टूट गया तो लोग घरों के फ्रिज की आइस क्यूब का इस्तेमाल करने लगे। सबसे खास यह है कि तीन सप्ताह के पर्व के आखिरी दिन पितरों को तर्पण किया जाता है। उस दिन आठ दीपक जलाकर उन्हें याद किया जाता है और सुख समृद्धि की कामना की जाती है।
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विस्थापन से पूजा पद्धति का हुआ विस्तार
कश्मीरी पंडित उपेंद्र अंबरदार, अजय रैना व एमके धर का कहना है कि विस्थापन से पंडितों का स्थान जरूर बदला। उन्हें कश्मीर से हटने को बाध्य होना पड़ा, लेकिन उनकी दृढ़ता में कमी नहीं आई। विस्थापन से शैव परंपरा और महाशिवरात्रि की पूजन पद्धति का विस्तार हुआ। घर-घर में मनाए जाने वाले इस पर्व में परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं। यदि कोई नहीं आ पाता है तो उसे पोस्ट के जरिये प्रसाद भेजा जाता है। यह प्रसाद देश-विदेश सभी जगह जाता है। अपने परिचितों को भी प्रसाद भेजने की परंपरा है। प्रसाद स्वरूप अखरोट होता है। यह विषम संख्या में बांटा जाता है।