रियासत के महाराजा हरि सिंह के पुत्र डा. कर्ण सिंह ने राजभवन की वापसी के लिए केस दर्ज किया है। इस संबंध में डा. सिंह ने हरि-तारा चैरिटेबल ट्रस्ट के मार्फत अदालत में केस दर्ज किया है।
जम्मू के प्रिंसिपल सेशन जज आरएस जैन ने याचिकाकर्ता के वकील विक्रम सिंह की दलीलें सुनने के बाद मुख्य सचिव और पीडब्ल्यूडी सचिव को नोटिस जारी कर 12 मई तक जवाब मांगा है।
याचिका में रणबीर महल और करण निवास को ट्रस्ट के हवाले करने के साथ उसके गैरकानूनी रूप से उपयोग के लिए 1,63,68,000 रुपये मुआवजा मांगा है।
साथ ही जब तक संपत्ति ट्रस्ट के हवाले नहीं की जाती, तब तक इसके उपयोग के लिए 50 हजार रुपये रोजाना देने की मांग की है। साथ ही उस पर 24 फीसदी सालाना ब्याज भी अदा करने को कहा गया है।
एक माह की लीज पर लिया था भवन
याचिका में कहा गया कि रियासत की महारानी और डा. कर्ण सिंह की पत्नी स्व. याशो राज्या लक्ष्मी की प्रदेश में कई संपत्तियां हैं। उन संपत्तियों में से 126 कनाल जमीन पर बने ‘रणबीर महल’ और ‘करण निवास’ के अलावा आउट हाउस में राजभवन बना हुआ है।
इसमें सर्वेंट क्वार्टर, लान, सड़कें, पेड़, बगीचा, पांच गार्ड रूम इत्यादि शामिल है। इस संपत्ति को एक-एक माह की लीज पर लिया गया है। संपत्ति की मालकिन महारानी लक्ष्मी ने एक मई 1967 को लीज डीड समाप्त कर दी थी।
उसके बाद एक मई 1967 से आपसी सहमति के तहत 4000 हजार रुपये प्रति माह इसका किराया दिया जाने लगा। इसके बाद डा. कर्ण सिंह ने हरि-तारा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया और राजभवन से जुड़ी संपत्ति व मांडा हाउस स्थित तीन स्टाफ क्वार्टर उनके नाम कर दिए।
डीड हुई समाप्त, वापस किया जाए भवन
17 जनवरी 1970 को जम्मू के सब रजिस्ट्रार ने इसे पंजीकृत किया। याचिका में कहा गया कि ट्रस्ट की उक्त इमारत व संपत्ति का इस्तेमाल राज्यपाल के निवास और कार्यालय के रूप में किया जाता रहा, जबकि ट्रस्ट को इसकी ज्यादा जरूरत है, क्योंकि इससे होने वाली आय चैरिटेबल कामों में उपयोग होती है।
सरकार के पास और भी कई विकल्प हैं, जहां राजभवन को स्थानांतरित किया जा सकता है। चूंकि डीड समाप्त हो चुकी है, इसलिए ट्रस्ट के पास अधिकार है कि वह संपत्ति को वापस ले सके। महत्वपूर्ण यह है कि प्रतिवादी रियासत के राज्यपाल को एक रिहायशी स्थल उपलब्ध करवाने में सक्षम नहीं है। वादी की इच्छा के खिलाफ यह परिसर सरकार नहीं रख सकती। जेएनएफ