बारह वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 22 दिसंबर 2003 को डोगरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इसके 16 साल बाद यानी दो सितंबर 2020 को डोगरी को जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के 19 साल के बाद भी डोगरी भाषा कई चुनौतियों का सामना कर रही है। इसे वह सम्मान नहीं मिला पाय जो मिलना चाहिए था।
डोगरी भाषा में साहित्य लिखा जा रहा है, लेकिन साहित्यकारों को उसके पाठक नहीं मिल रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण डोगरी भाषा को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल न करना भी है। अगर मातृ भाषा डोगरी को प्राइमरी स्तर की पढ़ाई से लागू किया जाए तो बच्चों में इसके प्रति सम्मान बढ़ेगा। जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध डोगरी लेखक और डुग्गर मंच के निदेशक मोहन सिंह और डोगरी अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी से पुरस्कार से सम्मानित नीलम सरीन ने डोगरी भाषा की चुनौतियों पर अपनी बात रखी।
पाठक और मंच की कमी से जूझ रहा साहित्यकार
नीलम सरीन ने कहा कि 19 साल में डोगरी भाषा के विकास में जितना काम होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ। डोगरी भाषा में लिखने वाले के सामने बड़ी चुनौती है। वह लिखते तो हैं, लेकिन उन्हें पाठक ही नहीं मिलते। डोगरी के प्रति युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए साहित्यकारों को कुछ नया और हट कर साहित्य लिखना होगा। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने से डोगरी भाषा को बढ़ावा मिला है, लेकिन अभी भी लोगों में भाषा के प्रति सम्मान नहीं है। इसे बदलने की जिम्मेवारी डोगरी के साहित्यकारों की है।
स्कूलों में मातृ भाषा में पढ़ाई हो शुरू
मोहन सिंह ने कहा, डोगरी भाषा में साहित्य लिखा जा रहा है, जो अन्य भाषा के मुकाबले काफी अच्छा और पाठकों को समृद्ध करना वाला है, बावजूद इसके डोगरी भाषा के सामने कई चुनौतियां हैं। हमारी युवा पीढ़ी मातृ भाषा से दूर हो रही है। इसके कई कारण हैं, लेकिन एक बड़ा कारण मातृ भाषा में प्राइमरी स्तर की पढ़ाई का नहीं होना भी है। मातृ भाषा में पढ़ाई होने से बच्चों में इसके प्रति सम्मान बढ़ेगा। दो साल पहले डोगरी को अन्य पांच भाषाओं के साथ राजकीय भाषा का दर्जा मिला था, लेकिन वह सिर्फ कागजों में है। कोई भी राजकीय कामकाज डोगरी में नहीं होता है। डोगरी के संरक्षण के लिए सभी संगठनों को एक मंच पर आना होगा।
स्कूलों में डोगरी पढ़ाने की जरूरत है। डोगरी भाषा पढ़ने के बाद रोजगार की क्या संभावनाएं है, इसके प्रति युवाओं को जागरूक करना होगा। जम्मू विश्वविद्यालय के डोगरी विभाग में युवा प्रवेश ले रहे हैं। सरकार को डोगरी से जुड़ी संस्थाओं को साथ लेकर काम करना होगा। सरकारी स्कूलों में डोगरी पढ़ाई भी जा रही है, लेकिन निजी स्कूलों में तो बच्चों को डोगरी भाषा में बात करने की भी अनुमति नहीं दी जा रही है। युवा पीढ़ी को डोगरी भाषा के प्रति आकर्षित करने के लिए हमें उस तरह का कंटेट तैयार करना होगा।
-पदम देव सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर डोगरी विभाग, जम्मू विवि।