भले ही खुद की जिंदगी बेरंग हो, लेकिन दूसरों की जिंदगी में रंग भरना बड़ी बात है। नेहा घर में जिंदगी गुजार रहीं बेसहारा महिलाओं ने दीपावली के दीयों में जो रंग भरे हैं, वे दिल को छू लेने वाले हैं। नेहा घर में रह रहीं महिलाएं दूसरों की दिवाली रोशन करने में जुटी हैं। बेसहारा महिलाएं आत्मनिर्भरता और मेहनत को जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान देती हैं।
राज्य के अलग-अलग हिस्सों की रहने वाली इन महिलाओं को अपनों ने ठुकराया है लेकिन इन्होंने जिंदगी को ठुकराने की बजाय हिम्मत से हर मुसीबत का सामना करना सीख लिया है। जम्मू जिले की रहने वाली स्वाती अपने आप को बेसहारा नहीं मानती हैं। उसके साथ उसके दो बच्चे भी इसी नेहा घर में रह रहे हैं। दिवाली पर मिट्टी के दीयों में रंग भरकर उन्हें बेचना ही इनका लक्ष्य नहीं है, बल्कि इसे वह अपना हुनर मानती हैं।
इससे उनकी सिर्फ आर्थिक मदद ही नहीं होती है, बल्कि दिवाली का एक दीया जब किसी के घर अंधेरे को चीरता हुआ रोशनी का प्रकाश फैलाता है तो उस रोशनी की लौ को स्वाति अपनी जिंदगी में महसूस करती है। किश्तवाड़ की रहने वाली इफ्त बी कहती हैं कि यह दीये सिर्फ हमारी कमाई का साधन नहीं हैं, बल्कि किसी के त्योहार में हमारी भागीदारी है।
केंद्र सरकार द्वारा मिलने वाले अनुदान से चलने वाले नेहा घर में इन बेसहारा महिलाओं को हुनरमंद बनाने हेतु हर तरह का काम सिखाया जाता है। मिट्टी के साधारण से दिखने वाले दीयों को रंगों से सुंदर बनाने में जुटी विजयपुर की अजीत कौर इसे अपनी बेरंग जिंदगी की बेरौनकी दूर करने का बेहतर तरीका मानती हैं। नेहा घर के बाहर एक टेबल लगाकर दीयों को बेचने के लिये रखा जाता है। पूरे दिन में अच्छी-खासी बिक्री भी हो जाती है।
हर बिकते दीये के साथ हुनरमंदों के चेहरे पर दिवाली जैसी रोशनी देखने को मिलती है। इन महिलाओं की काउंसिलर सुहानी शर्मा कहती हैं कि मेरा काम यूं तो इनकी परेशानियों को सुनना, हल करना और उन्हें आगे तक पहुंचाना है, लेकिन कई बार इनका जज्बा देखकर मैं स्वयं भी दंग रह जाती हूं। हर दशहरे पर मैं इनकी जिंदगी में दुख रूपी रावण के जलने की कामना के साथ ही हर दिवाली पर इनकी जिंदगी में रोशनी की भी कामना करती हूं।