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संवाद: अधिकारों से वंचित पहाड़ी समुदाय की अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग, सामाजिक-राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की वकालत

Mon, 07 Feb 2022 04:51 PM IST
विमल शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

सरहद के पास रहने वाले 15 लाख पहाड़ी समुदाय ने राजनीतिक सशक्तीकरण की आवाज बुलंद करते हुए अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की वकालत की है। उन्होंने कहा कि 15 लाख की आबादी की हमेशा अनदेखी की गई।  

 
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अमर उजाला संवाद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर के दूरदराज क्षेत्रों और सरहद के पास रहने वाले 15 लाख पहाड़ी समुदाय ने राजनीतिक सशक्तीकरण की आवाज बुलंद करते हुए अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की वकालत की है। अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में जम्मू, राजोरी, पुंछ में रहने वाले पहाड़ी समुदाय के लोगों का कहना है कि उनकी स्थिति आज भी चिंताजनक है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर पिछड़े इस समुदाय को मुख्यधारा में लाने के कभी गंभीर प्रयास भी नहीं हुए। अनदेखी के बीच समुदाय के लोग अब सरकार से अनुसूचित जनजातीय समुदाय (एसटी) के दर्जे की मांग कर रहे हैं।

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पहाड़ी समुदाय के लोगों का कहना कि वह एसटी समुदाय में शामिल होने के मानदंडों पर खरा उतरते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि हमें 70 वर्षों से अपने हकों से वंचित रखा गया है। इसकी वजह से पिछड़ते चले गए। जम्मू संभाग में दस जिलों में दो जिले पुंछ और राजोरी में 74 फीसदी आबादी पहाड़ी समुदाय से आती है। प्रदेश में विकास और बदलाव की बयार की हर स्तर पर चर्चा हो रही है, लेकिन आज भी सबका साथ-सबका विश्वास और सबका विश्वास होने का इंतजार है। 

राज्य पुनर्गठन से समुदाय को हुआ नुकसान 
पांच अगस्त 2019 के फैसले का हमने भी स्वागत किया था। इसमें जनजातीय समुदाय को सरकार ने विस्तृत वर्णन किया है। पूर्व में पहाड़ी समुदाय के प्रति सरकार की नीतियां स्पष्ट नहीं थीं। 2014 में पहाड़ी समुदाय को चार फीसदी आरक्षण देने का फैसला पांच साल बाद लागू हुआ। सरकार का रवैया हमारे प्रति निराशाजनक रहा है। - नितिन शर्मा,  शोधार्थी  

 

पहाड़ी समुदाय की स्थिति चिंताजनक 

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पहाड़ी समुदाय के लोगों की स्थिति चिंताजनक है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े हैं। आलम यह है कि अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। प्रतिस्पर्धा के दौरान हमारे बच्चे समृद्ध वर्ग के बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते हैं। हमारी जमीनी स्थिति को देखकर सरकार हमें जनजातीय समुदय का दर्जा दे, ताकि पहाड़ी समुदय का विकास हो और वह मुख्यधारा में शामिल हो सकें। पहाड़ी समुदाय को गृहमंत्री से आश्वासन के बाद उम्मीद जागी है कि अब उनकी सुनाई होगी।  - नदीम रफीक खान, एडवोकेट, पुंछ

 

पूर्व में बनी कमेटियों की रिपोर्ट को लागू किया जाए
पहाड़ी समुदाय के लोग ज्यादातर दूरदराज गांव और सरहद के पास रहते हैं। पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजातीय समुदाय में शामिल होने की पैरवी संविधान का अनुच्छेद 341 और 342 भी करता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख खान ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर पैरवी की थी। 2012 में केंद्रीय सचिव के निर्देश पर पीरजादा अमीन की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र कमेटी बनी, जिसने जमीनी स्तर पर जाकर पहाड़ी समुदाय का अध्ययन कर 2016 में अपनी रिपोर्ट सौंप और समुदाय को एसटी का दर्जा देने की पैरवी की। सरकार को इन कमेटियों की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए हक देना चाहिए। - विक्रांत शर्मा 

 

राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की जरूरत 
पहाड़ी समुदाय को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की जरूरत है। हम सरकार से मांग करते हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले पहाड़ी समुदाय को एसटी का दर्जा दिया जाए, ताकि अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर सकें। आजादी से लेकर अभी तक हमारा उपयोग सिर्फ एक वोटर के तौर पर हुआ है। हमें अधिकारों से वंचित रखा गया है। हम सरकार से अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं। पहाड़ी समुदाय सबसे पिछड़ा हुआ है। उसे सरकार की मदद की जरूरत है।  -गुरुदेव सिंह ठाकुर, एडवोकेट 

 

हर स्तर पर संगठन बनाने की जरूरत 
पहाड़ी समुदाय एसटी समुदाय का दर्जा पाने के सभी मापदंड को पूरा करता है। हमें जनजातीय समुदाय होने के आधार पर एसटी का दर्जा देने की बात करते हैं। सरकार ने पहाड़ी भाषी लोगों को चार फीसदी आरक्षण दिया। लेकिन इसमें आठ लाख तक की आय की बाधा लगा दी है। इससे इसका लाभ सभी लोगों तक नहीं पहुंच रहा। अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिए हमें हर स्तर पर संगठन बनाने की जरूरत है। सरकार सभी तरह की सुविधाएं एक वर्ग को देकर दूसरे को नजरंदाज नहीं कर सकती है।  - डॉ. खालिक अंजुम 

 

70 वर्षों से सिर्फ एक वोटर के रूप में हुए इस्तेमाल
70 वर्षों से हमें सिर्फ एक वोटर के रूप में इस्तेमाल किया गया है। हमारे वोट से लोग राजनेता तो बन जाते हैं, लेकिन जब हमें अधिकार देने की बात आती है, तो अड़चनें लगाते हैं। पहाड़ी समुदाय को एसटी का दर्जा देने की मांग और संघर्ष काफी पुराना है। सुविधाओं के अभाव में हमारे बच्चे आज भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। हमारे पास रोजगार के साधन नहीं है। एसटी समुदाय में पहाड़ी समुदाय को शामिल करने की मांग संवैधानिक है। - संजय केसर 

 

भारत-पाक बंटवारे से शुरू हुई बदहाली की कहानी  
1947 में जब भारत का बंटवारा हो रहा था, तब सबसे ज्यादा नुकसान पुंछ-राजोरी के लोगों का हुआ है। दूरदराज गांवों में रहने वाले लोगों की बदहाली की कहानी भारत-पाक बंटवारे से ही शुरू हो गई। हमारे गांव में रहने वाले गुज्जर-बक्करवाल को एसटी का दर्जा मिला, लेकिन हमें उससे दूर रखा गया। पहाड़ी समुदाय के पास सरकारी नौकरी के अलावा रोजगार का कोई अन्य साधन नहीं है। पहाड़ी समुदाय किसी एक धर्म विशेष का नहीं है, इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख सहित अन्य धर्म के लोग भी आते हैं। हमें उम्मीद है इस बार सरकार हमारी मांग को मानेगी। -भारत भूषण वैद

 

आरक्षण नहीं एसटी का दर्जा देने की कर रहे मांग 
आजादी के बाद हुए सभी युद्ध में पहाड़ी समुदाय सबसे ज्यादा भुक्तभोगी रहा है। हमारे समुदाय को 1947 से छला गया है। प्रदेश में बनी राजनीति पार्टियों में पहाड़ी समुदाय के लोगों का बड़ा योगदान रहा है। पहाड़ी समुदय को अगर एसटी का दर्जा नहीं मिलता है, तो उनकी राजनीतिक पहचान खत्म हो जाएगी। हम सिर्फ एक वोटर बनके रह जाएंगे। सरकारों ने हमें राजनीतिक सशक्तीकरण से दूर रखा। केंद्र की सरकार सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास की बात करती है। हमें उम्मीद है कि इस बार पहाड़ी समुदाय का भी विकास और विश्वास बढ़ाया जाएगा। कुछ लोग हमारे संघर्ष को गुमराह करने की कोशिश रहे हैं। हमारी मांग आरक्षण की नहीं, एसटी का दर्जा देने की है।  - अहसान मिर्जा, एडवोकेट 

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