शालामार स्थित एसएमजीएस अस्पताल में नवजात बच्चे की मौत के बाद सोमवार को अस्पताल परिसर में हंगामा हुआ।
हंगामे में नवजात बच्चे के घर वालों ने डाक्टरों पर कोताही बरतने का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर समय रहते डाक्टर बच्चे का इलाज करते तो बच्चे की जान नहीं जाती, जबकि अस्पताल के जूनियर डाक्टर तीमारदारों द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने के विरोध में काम छोड़कर हड़ताल पर चले गए।
इससे अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बना रहा। जीएमसी प्रिंसिपल द्वारा इस मामले में एफआईआर दर्ज करवाने और सुरक्षा का आश्वासन मिलने पर छह घंटे की हड़ताल के बाद जूनियर डाक्टर काम पर लौटे।
मृत नवजात के पिता अशोक (निवासी डिग्यिाना, प्रीत नगर) ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे को शुक्रवार की दोपहर अस्पताल में चेकअप करवाने के बाद डेढ़ महीने के बाद लगने वाला इंजेक्शन लगवाया था।
उन्होंने बताया कि घर पहुंचने के बाद इंजेक्शन के बाद स्वाभाविक तौर पर बच्चे को शनिवार की देर शाम काफी तेज बुखार चढ़ा, जो देर रात तक ठीक ही नहीं हो पाया।
बच्चे की बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्होंने रविवार को एसएमजीएस अस्पताल में बच्चे को इमरजेंसी में भर्ती करवाया। उनके बार-बार आग्रह करने के बावजूद कोई डाक्टर उनके बच्चे को देखने नहीं आया।
उन्होंने बताया कि अस्पताल में ड्यूटी दे रहे इंटर्न डाक्टर ने बच्चे की जांच कर कहा कि सोमवार की सुबह होने वाली ओपीडी में बड़े डाक्टर से अपने बच्चे को चेक करवा लेना। वहीं रविवार देर रात बच्चे की हालत खराब होने पर वार्ड में ड्यूटी दे रही नर्स ने बच्चे को ड्रिप और आक्सीजन लगा दी।
सुबह सीनियर डाक्टरों के वार्ड में पहुंचने के दौरान उन्होंने अपने बच्चे की मेडिकल फाइल दिखाई तो डाक्टर ने उनके सामने फाइल को फाड़ दिया और कहा कि उनका बच्चा दिल की बीमारी से ग्रस्त है। उन्होंने बताया कि इमरजेंसी में वरिष्ठ डाक्टर की गैर मौजूदगी के कारण वह अपने इकलौते बच्चे को खो बैठे।
उन्होंने बताया कि रविवार की छुट्टी होने के कारण उनके बच्चे ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया। दूसरी ओर डाक्टरों का कहना है कि नवजात बच्चे के घर वालों ने परिसर में बवाल मचाया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया। अस्पताल में एकजुट हुए जूनियर डाक्टर घटना के विरोध में हड़ताल पर चले गए।
सुबह छह बजे से 11 बजे तक डाक्टर काम छोड़ कर नारेबाजी करते रहे। बाद में डाक्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल जीएमसी के प्रिंसिपल घनश्याम देव गुप्ता से मिला और सारी बात बताई। डाक्टरों की मांग पर प्रिंसिपल ने मामले में एफआईआर दर्ज करवाने और डाक्टरों को सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन दिया, जिसके बाद डाक्टर काम पर लौटे।