परगवाल। वैसे तो बैसाखी का पर्व उत्तर भारत में मनाया जाने वाला पर्व है। कहते हैं इस दिन अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। वहीं बैसाखी कृषि पर्व के तौर पर भी मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन रवि की फसल पक कर तैयार हो जाती है और किसान इस दिन फसल काटकर बैसाखी के त्योहार को मनाते हैं। इसके विपरीत अधिकतर सांस्कृतिक त्योहार गांवों से लुप्त होते जा रहे हैं। यह चिंता का विषय है। यह कहना है सरहद पर रहने वाले परगवाल गांव के ज्यादातर बुजुर्गों का। उनका कहना है कि पहले इस पर्व का वह बेसब्री से इंतजार करते थे। वैशाखी पर मेले का आयोजन होता था। मेल-मिलाप से प्यार बढ़ता था, लेकिन कुछ वर्षों से क्षेत्र में बैसाखी का मेला नहीं होने पर उन्होंने दुख जताया।
धूमधाम से मनाया बैसाखी पर्व
अखनूर। सीमावर्ती क्षेत्र में बैसाखी का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर मंदिरों में लोगों ने पूजा की और अपने परिवार के लिए सुख-शांति की प्रार्थना की। वहीं दूसरी ओर कस्बे के चिनाब दरिया में हजारों की संख्या में श्रद्धालु ने स्नान कर पूजन किया। महिलाओं ने व्रत रखकर किश्ती के मिलह को वेआ भेट किया। कस्बे के चिनाब दरिया के जियो पोता घाट पर इस अवसर पर विशाल मेले का आयोजन किया गया। बच्चों के लिए झूले का प्रबंध था। कस्बे के बाबा सुंदर सिंह गुरुद्वारा सुबह से ही भरा था। इस मौके पर कीर्तन का आयोजन किया गया और लंगर में संगत ने प्रसाद ग्रहण किया। संवाद