जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों को बचाने के लिए प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठाया है। वन्यजीव संरक्षण विभाग ने प्रदेश के सभी संरक्षित क्षेत्रों में सिंगल-यूज प्लास्टिक (एसयूपी) और गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे के इस्तेमाल, बिक्री और निपटान पर तत्काल प्रभाव से पूरी तरह रोक लगा दी है। मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ. सुनीश बक्शी की ओर से जारी अधिसूचना को जम्मू एंड कश्मीर प्रोटेक्टेड एरियाज (प्लास्टिक-फ्री) ऑर्डर, 2026 का नाम दिया गया है।
ये पाबंदी प्रदेश के सभी राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों, संरक्षण भंडारों और वेटलैंड्स के साथ-साथ प्रवेश द्वारों, ट्रेकिंग रूट्स, कैंपिंग साइट्स, पर्यटन और तीर्थयात्रा मार्गों पर भी लागू होगी। प्रशासन ने यह फैसला प्लास्टिक कचरे से हंगुल, हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग, भालू और प्रवासी पक्षियों जैसी दुर्लभ प्रजातियों के स्वास्थ्य और आवास पर मंडराते गंभीर संकट को देखते हुए लिया है।
नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, संरक्षित क्षेत्रों में जाने वाले पर्यटकों, ट्रेकर्स और तीर्थयात्रियों के लिए 'जो सामग्री अंदर ले जाएंगे, उसे अनिवार्य रूप से वापस लाना होगा' का नियम लागू किया गया है। प्लास्टिक के कप, प्लेट, चम्मच, स्ट्रॉ, पैकेजिंग फिल्म, प्लास्टिक स्टिक वाले ईयरबड्स और झंडे ले जाने पर पूरी तरह से मनाही होगी। इसके बजाय, स्टील व कांच की बोतलों और पानी के रिफिलिंग स्टेशनों को बढ़ावा दिया जाएगा।
आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन क्षेत्रों में मौजूद होटल, ढाबे, कैंटीन और वेंडर प्रतिबंधित प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। कचरे को खुले में जलाने या जमीन में दबाने पर भी सख्त रोक है। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत भारी जुर्माना, जब्ती और कानूनी कार्रवाई होगी। बार-बार नियम तोड़ने वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लाइसेंस और परमिट भी रद्द किए जा सकते हैं।
प्रशासन का कहना है कि प्लास्टिक के अनियंत्रित उपयोग से दुर्लभ प्रजातियों जैसे हंगुल, भूरा व काला भालू, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग और प्रवासी पक्षियों के आवास व स्वास्थ्य पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। विभाग ने संरक्षित क्षेत्रों में आने वाले पर्यटकों, ट्रेकर्स, तीर्थयात्रियों और वाणिज्यिक ऑपरेटरों के लिए सख्त दिशा-निर्देश तय किए हैं