सोलह बरस का पवन पढ़ने में होशियार है, लेकिन अब वह स्कूल नहीं जाता। चौथी कक्षा तक वह बिल्कुल ठीक था। फिर उसके पांव की नसें और हडि्डयों में विकार आने लगे।
नतीजतन उसके लिए चलना मुश्किल हो गया। जैसे तैसे वह स्कूल जा पाता था। आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते उसके हाथ की अंगुलियों ने भी काम करना बंद कर दिया। अब पीठ पर कूबड़ हो गया है।
पढ़ाई छोड़कर अब घर पर ही है। उसके चचेरे भाई राजू की हालत और भी दयनीय है। 23 साल से बिस्तर पर पड़ा राजू घरवालों की मदद से ही करवट बदल सकता है।
कठुआ जिले के गोविंदसर गांव और सटे इलाकों में रहस्यमय बीमारी से जूझ रहे ऐसे दर्जन मामले हैं, जिसके शिकार बच्चे या तो पैदाइशी अंगहीन हैं या फिर शरीर के विकास क्रम में उनके लिए चलना-फिरना तो दूर अपने हाथों से निवाला खाना भी मुश्किल हो गया।
पवन के पिता अशोक कुमार बताते हैं कि गांव में ऐसे दर्जनों मामले हैं। बच्चे के इलाज के लिए वह देहरादून भी गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उनकी आंखों के सामने पवन का शरीर तिल-तिल मर रहा है।
डाक्टरों ने भी बच्चे की उम्र कुछ साल तक ही बताई। राजू की मां शारदा देवी की आंखें बेटे का जिक्र छिड़ने पर छलक जाती हैं। शारदा देवी के अनुसार हर मुमकिन कोशिश करने के बावजूद कुछ भी हासिल नहीं हो पाया है।
दोनों बच्चों के अभिभावक कहते हैं कि बीमारी का इलाज भले न हो, लेकिन बीमारी की वजह तो पता की जानी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां बची रहें।
इसी मोहल्ले से सटे दूसरे मोहल्ले का सोलह वर्षीय शम्मी कुमार जन्म से एक पांव और एक हाथ से मोहताज है। पिता नरवंत कुमार के अनुसार बीमारी का आज तक पता नहीं चल पाया है तो इलाज कैसे करवाते।