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मोदी-उमर की दूरियां बनने लगीं नजदीकियां

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सियासत की कुशल बाजीगरी के लिए मशहूर नरेंद्र मोदी के दिवाली दांव से विरोधी भी चित हो गए हैं। मोदी शुरू से अंत तक दौरे को सियासत से अलग बताते रहे लेकिन दौरे के साथ ही सियासत गरमा गई। अलगाववादियों ने बंद के जरिए अपनी मौजूदगी जतानी चाही तो युवा कांग्रेस ने विरोध रैली के बहाने वोट बैंक बचाने की कोशिश की।
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भाजपा ने स्वागत रैली के जरिए विरोधियों पर हमला बोला। इस सियासी शोरगुल के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और प्रधानमंत्री मोदी के बीच निकटता भी बढ़ी। भाजपा के मिशन 44 प्लस को पंख लग गए।

मोदी ने उमर की तारीफ की तो उमर ने शुक्रिया अदा कर नई दोस्ती का संकेत दिया। उमर मोदी के कट्टर आलोचक रहे हैं। टिवटर को मोदी विरोध का अस्त्र ही बना लिया था।
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लेकिन, जब मोदी ने बाढ़ पीड़ितों के बीच दिवाली मनाने का ऐलान किया तो उमर ने न सिर्फ इसकी तारीफ की बल्कि पीडीपी और कांग्रेस ने मोदी के ईद में श्रीनगर नहीं आने का मुद्दा उठाया तो उमर मोदी के पक्ष में खड़े हो गए।

आलोचना की सियासत को उमर ने कोसा

उमर ने कहा कि जो लोग दौरे पर सवाल खड़े कर रहे हैं वे तब भी विरोध करते यदि दौरा ईद में होता। तब सुरक्षा व्यवस्था से ईद में खलल का मुद्दा उठाया जाता। अलगाववादियों का बंद तब भी होता। सिर्फ विरोध के लिए आलोचना की सियासत को उमर ने कोसा।

दरअसल, हाल के दिनों में पीडीपी ने मोदी के करीब आने की पहल की थी। सांसद महबूबा मुफ्ती बाढ़ पीड़ितों के लिए मोदी से मिलीं। पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद का झुकाव भी मोदी की ओर बढ़ा। अब नेशनल काफ्रेंस भी मोदी के करीब आने की होड़ में शामिल हुई।

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चुनावी गणित ने उमर को मजबूर किया

दरअसल चुनावी गणित ने उमर को मजबूर किया है। उमर ने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी नतीजों का असर जम्मू कश्मीर पर पड़ने की संभावना जताकर रियासत में भाजपा के जनाधार को पहली बार सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिलीं तीन सीटों उधमपुर, लद्दाख और जम्मू संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 41 सीटें हैं।

लोकसभा चुनाव में 36 प्रतिशत से अधिक वोट लेकर भाजपा रियासत में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। अब यह प्रदर्शन दोहरा कर मिशन 44 प्लस हसिल करने की रणनीति पर चल रहे मोदी को अहसास है कि रियासत में अपने बूते सरकार बनाना मुश्किल है। लिहाजा वह चुनाव बाद गठबंधन के हर विकल्प को खुला रखना चाहते हैं।
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