सरहद भी दोस्ती के अटूट बंधन को तोड़ नहीं पाई। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तीन युद्ध भी दो दोस्त परिवारों के दिलों के बीच विभाजन रेखा खींचने में विफल रहे।
भारत और पाकिस्तान जब अपनी स्वतंत्रता का जश्न इस सप्ताह मनाने जा रहे हैं तब दोस्ती की यह बेमिसाल कहानी तब ताजा हो गई जब टंडन और मुगल परिवार फिर मिले।
मुगल परिवार जब कारवां-ए-अमन बस सेवा से पहुंचा तो टंडन परिवार के सदस्यों की आंखें खुशी से छलक पड़ीं। दोनों परिवारों के बीच दोस्ती की यह कहानी देश विभाजन से पहले मुजफ्फराबाद में शुरू हुई थी।
2005 में बिछड़े दोस्त से मिलने की थी पहल
जेएल टंडन को 1947 में विभाजन के वक्त मुजफ्फराबाद छोड़ना पड़ा था। तब वह अपने बचपन के दोस्त मेहमूद मुगल से जुदा हो गए थे।
मेहमूद और उनकी पत्नी जब पीओके से आए तो टंडन परिवार 300 किमी की दूरी तय कर उनके स्वागत के लिए जम्मू से एलओसी पर पहुंचा।
दो बिछड़े दोस्त जब मिले थे तो जुबान खामोश थी और दोनों के आंसू थमने के नाम नहीं ले रहे थे। टंडन ने ही 2005 में अपने बिछड़े दोस्त से मिलने की पहल की थी।
किस्मत ने भी लिया इम्तहान
उन्होंने अपने पुत्र सुभाष के साथ मुजफ्फराबाद जाने के लिए परमिट ली लेकिन किस्मत तब दूसरा इम्तहान लेने का मूड बना चुकी थी।
उनके मुजफ्फराबाद पहुंचते ही भयानक भूकंप आया जिसमें एक लाख 31 हजार लोग मारे गए। मुगल परिवार के छह लोगों की जानें भी इस हादसे में चली गईं।
तब के हादसे को याद कर सुभाष बताते हैं कि वह और उनके पिता भी मलबे में दब गए थे। मलबे से निकालकर उन्हें हेलीकाप्टर से इस्लामाबाद पहुंचाया गया। तब मुगल परिवार ने ही उनकी तीमारदारी की थी।