जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में 44 सीटों के जादुई आंकड़े जुटाने के लिए भाजपा को कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रही है। तमाम सर्वे रिपोर्ट खंगाले जा रहे हैं। भाजपा आलाकमान को महाराष्ट्र की तरह कश्मीर में भी एक पवार की तलाश है जो बिना शर्त समर्थन के अचूक हथियार से तमाम बाधाओं को पछाड़ दे।
पार्टी के रणनीतिकार भी मानते हैं कि तमाम जोड़तोड़ के बाद भी कश्मीर में किसी करिश्मे की जरुरत होगी। जम्मू और लद्दाख संभागों में पार्टी को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है लेकिन कश्मीर में वह साथी की खोज में क्षत्रपों के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। भाजपा चुनाव बाद समीकरणों के मद्देनजर पवार की भूमिका के लिए नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के लिए भी विकल्प खुला रखना चाहती है।
भाजपा पहली बार जम्मू कश्मीर चुनाव को बेहद गंभीर तरीके से लड़ रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा में जीत में भूमिका निभाने वाले आई प्रोफेशनल्स की टीम कश्मीर पहुंच रही है। भाजपा ने अपनी ओर से अब तक दो बार रियासत का सर्वे कराया है। निजी चैनल के सर्वे में भाजपा और पीडीपी को आसपास दिखाया गया है। एक सर्वे ने पीडीपी को ही बढ़त दिखाई है।
भाजपा की सूत्रों की मानें तो पार्टी के अपने सर्वे में भी 44 का आंकड़ा थोड़ा दूर दिखा है। विधानसभा की 87 सीटों में से 44 हासिल कर ही सरकार बनाई जा सकती है। कश्मीर में नेकां और पीडीपी ने जोर लगाया है। भाजपा इसमें सेंध लगाती दिखती है। पीपुल्स कांफ्रेंस के चीफ सज्जाद लोन कुपवाड़ा की पांच सीटों पर दमदार मौजूदगी दिखा सकते हैं लिहाजा उनसे डील हो चुकी है।
इसके अलावा कश्मीरी पंडितों के वोट बैंक के बूते कुछ सीटें हासिल करने की योजना है। हब्बाकदल और अमीराकदल सीटों के लिए जोर लगाया जा रहा है। भाजपा महासचिव राम माधव ने अलगाववादियों से भी मदद मांगी है। साथ ही वोटों के बहिष्कार के असर वाले क्षेत्रों में कम मतदान का फायदा उठाने की रणनीति पर भी काम हो रहा है। लोकसभा चुनाव में तीन सीटें और 32.4 प्रतिशत मत हासिल कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर चुकी है।
लोकसभा की तीन सीटों में भाजपा को विधानसभा की 41 सीटों पर बढ़त मिली थी। वह आंकड़ा भी 44 से कम था। विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे और स्थानीय प्रभाव वाले नेता भी चुनाव को प्रभावित करेंगे। नतीजतन भाजपा कड़ी मेहनत कर रही है। उधर पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नरम रुख का इजहार करने लगे हैं। कश्मीर के चार दौरों ने मोदी को मुख्यमंत्री उमर के करीब भी लाया था। क्षेत्रीय दलों की भाजपा से निकटता बनाने की होड़ से कांग्रेस अलग-अलग थलग पड़ रही है।