हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों के बाद अब देशभर की निगाहें जम्मू कश्मीर और झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों पर टिकी हैं। जम्मू-कश्मीर में छह साल बाद होने वाला चुनाव इस बार कई मायनों में खास भी बन गया है।
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क्योंकि उत्तर में यही एक राज्य है जहां भाजपा लाख प्रयास के बाद भी अपनी स्वीकार्यता और जानाधार नहीं बढ़ा सकी। हालांकि गत लोकसभा चुनावों में देशभर में चली मोदी लहर के बीच जरूर माहौल कुछ बदला और राज्य की आधी लोकसभा सीटें जीतकर भाजपा ने सत्तारूढ़ नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया।
उसी मोदी लहर के सहारे अब भाजपा रियासत में पहली बार अपने बूते सरकार बनाने का ख्वाब भी देखने लगी है। हालांकि मुस्लिम बहुल राज्य होने के बाद भी इस ख्वाब का हकीकत में बदलना मुश्किल नहीं है, क्योंकि हाल में संपन्न हुए हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने पहली बार दोनों राज्यों में अपने बूते सरकार बनाने का चमत्कार कर दिखाया है ऐसे में घाटी में भी कमल खिलना असंभव नहीं दिखाई पड़ता।
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मोदी की लहर, वाजपेयी का नाम दिलाएगा विजय
आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा की सबसे बड़ी उम्मीद मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व और उनके नाम की लहर है। लोकसभा चुनावों के सालभर पहले से शुरू हुई मोदी लहर ने पूरे देश में भाजपा का डंका बजवाया तो असर रियासत में भी दिखाई दिया।
जिसने घाटी की छह लोकसभा सीटों में से आधी पर कब्जा जमा लिया। चुनावों के छह महीने बाद भी मोदी लहर का जादू बदस्तूर जारी है। इसका नजारा हालिया हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों में भी दिखाई दिया। ऐसे में जम्मू कश्मीर का भी इससे अछूता रहना मुश्किल है।
खासकर जम्मू संभाग में तो पार्टी काफी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। इसके अलावा कश्मीर के भी कुछ इलाकों में इस बात की पूरी संभावना है कि उदारवादी मुसलमान इस बार पार्टी को वोट कर सकते हैं।
दूसरी ओर एक सच यह भी है कि पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा के शिखर पुरुष अटल विहारी वाजपेयी को लेकर कश्मीर के लोगों के मन में आज भी सम्मान है। खुद मुख्य विपक्षी दल पीडीपी और सत्तारूढ़ नेशनल कान्फ्रेंस कश्मीर पर वाजपेयी की नीतियों की तारीफ कर चुके हैं। भाजपा भी इस बात को समझते हुए मोदी के साथ वाजपेयी का नाम आगे रखकर वोट मांग रही है।
बाढ़ के बाद बढ़ी मोदी की सक्रियता दिलाएगी फायदा
हाल ही में सितंबर माह में घाटी में आई भंयकर बाढ़ ने बेशक कश्मीर के लोगों के जीवन को अस्त व्यस्त कर दिया है, लेकिन भाजपा को इसमें भी अपने लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। बाढ़ के बाद से ही मोदी ने घाटी में अपनी सक्रियता काफी बढ़ा दी है।
आपदा के तुरंत बाद कश्मीर आए मोदी ने खुद को हर तरह से बाढ़ पीड़ितों के साथ खड़े होने की बात कही तो उनकी हर मदद का वादा भी किया। उसी दौरान मोदी ने 1 हजार करोड़ की मदद की घोषणा कर आगे भी हर तरह की मदद का आश्वासन दिया। वहीं सेना द्वारा बाढ़ के दौरान किए गए शानदार कार्यों का फायदा भी सत्तारूढ़ भाजपा को जरूर मिलेगा।
वहीं इसके कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी ने दिवाली कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के बीच मनाने की घोषणा कर खुद को उनके सुख दुख का साबित करने का एक सफल प्रयास किया। हालांकि विरोधियों ने जरूर उनके इस कदम की आलोचना की लेकिन आम जनता के बीच उनकी इस पहल को काफी सराहा गया। लगे हाथ मौका देख मोदी ने भी बाढ़ पीड़ितों के लिए साढ़े छह सौ करोड़ पैकेज की घोषणा कर लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास किया।
सत्ता विरोधी लहर और अलगाववादियों का हाशिये पर जाना
घाटी में भाजपा को जो सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है वो है सत्ता विरोधी लहर का। पिछले छह साल के कार्यकाल में एनसी और कांग्रेस की एनसी सरकार ऐसा कोई खास कार्य नहीं कर सकी जिसे लेकर चुनावों में वो जनता के बीच वोट मांग सके। खुद उमर ने दो दिन पूर्व इस बात को स्वीकार किया की कांग्रेस की गठबंधन सरकार के वो ज्यादा कुछ नहीं कर सके।
दूसरी ओर सरकार पर पक्षपात के आरोप भी लगते रहे। खासकर जम्मू संभाग के लोगों के साथ सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया कई बार सामने आया। चाहे वो रहबर ए जरात के डाक्टरों या अन्य सरकारी विभागों में प्रमोशन का मामला हो या विकास कार्यों का मामला हो। कुछ ऐसा ही दंश लेह लद्दाख की जनता को भी झेलना पड़ा।
जानकारों के अनुसार उमर सरकार का सारा ध्यान कश्मीर क्षेत्र में ही लगा रहा, लेकिन किया वहां के लिए भी कुछ खास नहीं। रही सही कसर बाढ़ के बाद बिगड़े हालातों ने पूरी कर दी। जहां लोगों ने राहत कार्यों को लेकर उमर सरकार पर नाकामी के आरोप लगा दिए।
ऐसे में इस बार के चुनावों में सबसे ज्यादा नुकसान में नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ही दिखाई दे रही हैं। जाहिर है इसका सीधा फायदा विपक्षी भाजपा और पीडीपी को जरूर मिलेगा। इसके अलावा घाटी में पहले के मुकाबले अलगाववादियों की सक्रियता और स्वीकार्यता दोनों घटी हैं।
यासीन मलिक, सैयद गिलानी और अन्य प्रमुख अलगाववादियों के चेहरे अब गाहे बगाहे या किसी बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान ही दिखाई देते हैं। उसमें भी उनके समर्थक गिनती के रहते हैं। इसके अलावा बाढ़ के दौरान घाटी के लोगों से दूरी बनाए रखने ने भी अलगाववादियों के ताबूत में कील ठोंकने का काम किया है।
जम्मू और लद्दाख में पार्टी का मजबूत कैडर
रियासत में भाजपा की सबसे बड़ी उम्मीद जम्मू और लद्दाख क्षेत्र हैं। जहां विधानसभा की 87 में से कुल 41 सीटें हैं। जिनमें से जम्मू संभाग में 37 और लेह लद्दाख में 4 सीटें हैं। लोकसभा चुनावों में भी इन्हीं दोनों क्षेत्रों की तीनों सीट जीतकर भाजपा ने यहां अपना वर्चस्व कायम कर एनसी और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया।
गत विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने यहां 11 सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की थी। ऐसे में मोदी लहर के बीच हो रहे चुनावों में पूरी उम्मीद है कि भाजपा जम्मू संभाग में कम से 25 और लद्दाख की चार में से तीन सीटों पर बढ़त बना सकती है।
इन दोनों क्षेत्रों में भाजपा का कैडर भी पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत हुआ है और पार्टी कार्यकर्ता ज्यादा जोश से चुनावों की तैयारियों में लगे हुए हैं। वैसे भी भाजपा का सारा फोकस इन्हीं 41 सीटों पर ज्यादा है। जिनमें से वह कम से कम 30 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
खास मुस्लिम चेहरों पर दांव, छोटी पार्टियों से दोस्ती
भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल मुसलिम बहुल कश्मीर संभाग है, जहां विधानसभा की सबसे ज्यादा 46 सीटें हैं। कश्मीर के दस जिलों में अच्छी खासी तादाद उस मुसलिम वर्ग की है जिसे आमतौर पर भाजपा विरोधी कहा जाता है। लेकिन इस किले को भेदने के लिए भी भाजपा ने पूरी रणनीति तैयार कर ली है।
इसी कड़ी में भाजपा ने 45 उम्मीदवारों की पहली सूची में 13 मुस्लिम चेहरों को मौका दिया। इनमें भी ज्यादातर चेहरे वो हैं जो राजनीति के अलावा सामाजिक रूप से काफी प्रतिष्ठा रखते हैं। इसके अलावा ज्यादातर उम्मीदवार युवा हैं, ऐसे में पार्टियों को युवाओं का भी अच्छा खासा वोट मिल सकता है।
श्रीनगर से किश्मत आजमा रही डेंटल सर्जन हिना बिलाल, अनंतनाग के नूराबाद से लड़ रहे मलिक मुश्ताक नूराबादी और देवसर सीट से भाजपा उम्मीदवार फयाज़ अहमद बट जैसे चेहरों की पुरानी राजनीतिक पृष्ठभूमि रही है। हिना बिलाल के पिता शफी बट तो पूर्व विधायक भी रह चुके हैं।
इसके अलावा भाजपा कश्मीर आधारित छोटी-छोटी पार्टियों को साध रही है। पीडीएफ के चीफ हकीम मोहम्मद यासिन की भाजपा के राम माधव से मुलाकात के बाद भाजपा ने गुलमर्ग में मीर और खान साहिब सीट पर यासिन के खिलाफ उम्मीदवार नहीं खड़ा करने का फैसला किया।
इसी तरह पीपुल्स कांफ्रेंस के चीफ सज्जाद लोन के खिलाफ हंदवाड़ा में भी भाजपा उम्मीदवार खड़ा नहीं करने का मन बना चुकी है। लोन के अन्य 18 उम्मीदवारों के खिलाफ भाजपा का दोस्ताना संघर्ष संभव है। कुल जमा भाजपा की निगाहें घाटी से कम से कम 15 सीटें निकालने पर हैं। इन्हीं 15 सीटों पर पार्टी का पूरा फोकस रहेगा।