रियासत में मौजूदा विधानसभा चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक तो लोकसभा चुनाव के साथ ही दो राज्यों में भाजपा को मिली अप्रत्याशित जीत के बाद मोदी-शाह की जोड़ी की असली अग्निपरीक्षा यहीं मानी जा रही है।
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मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर कितना बोल रहा है, यह यहां के चुनाव में साबित होने की बात कही जा रही है। दूसरा जम्मू संभाग की दो लोकसभा सीटों तथा लद्दाख की सीट पर कब्जा कर इसे बड़ी उपलब्धि मान रही पार्टी के जनाधार बढ़ने की भी परीक्षा की घड़ी है।
मिशन 44 प्लस का लक्ष्य पाने की चुनौती होगी। तीसरा यह चुनाव तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों, वर्तमान मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री की प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया है।
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पहले चरण में सात मंत्रियों के भाग्य का होगा फैसला
इतना ही नहीं पहले चरण में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सहित सात मंत्रियों की साख भी दांव पर है। मौजूदा विधानसभा चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री तथा नेकां संरक्षक डा. फारूख अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री तथा पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद तथा पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है।
अस्वस्थता की वजह से फारूख अब्दुल्ला के प्रचार अभियान में शामिल होने पर संशय है, लेकिन सईद और आजाद पिछले काफी दिनों से पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र के चप्पे-चप्पे की खाक छान रहे हैं।
रियासत में दोनों का बड़ा नाम है और वे यहां पार्टी का चेहरा माने जाते हैं। ऐसे में पार्टी की जीत-हार से उनका राजनीतिक भविष्य तय हो सकता है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ही नेकां में चेहरा हैं, जो पूरे सूबे में पार्टी को अपने दमखम के बल पर दोबारा सत्ता में लाने के लिए जुटेंगे।
राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह की साख भी दांव पर
इस दृष्टि से उनकी प्रतिष्ठा भी फंसी हुई है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डा. जितेंद्र सिंह की साख भी विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिले संख्या बल से तय होगा। इनकी जीत से पार्टी को जम्मू में बल मिला है।
विधानसभा के 25 नवंबर को होने वाले प्रथम चरण के चुनाव के साथ रियासत के मुख्यमंत्री सहित सात मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर है। मुख्यमंत्री गांदरबल से पिछला चुनाव जीते थे।
हालांकि, इस चुनाव में अब तक नेकां ने इस सीट के लिए प्रत्याशी घोषित नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी के मजबूत गढ़ रहे गांदरबल से ही दोबारा उमर अब्दुल्ला चुनाव मैदान में होंगे।
इसके साथ ही नेकां कोटे से गृह राज्य मंत्री सज्जाद अहमद किचलू (किश्तवाड़), पशुपालन मंत्री नजीर अहमद खान (गुरेज सीट) और प्रौद्योगिकी मंत्री फिरोज अहमद खान (कारगिल) और कांग्रेस कोटे के सड़क एवं भवन निर्माण मंत्री अब्दुल मजीद वानी (डोडा), शहरी विकास मंत्री नवांग रिगझिन जोरा (लेह) और बिजली राज्यमंत्री वकार रसूल (बनिहाल) की प्रतिष्ठा फंसी हुई है।
विधानसभा चुनाव में मुख्य रूप से राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस (नेकां), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), पैंथर्स पार्टी और बसपा मैदान में हैं। नेकां तथा पीडीपी का कश्मीर में जनाधार है। पैंथर्स पार्टी की जम्मू में सक्रियता अधिक है। कांग्रेस की जम्मू और कश्मीर दोनों ही संभाग में अच्छी पैठ बताई जाती है।
भाजपा का जम्मू में मजबूत जनाधार है। लद्दाख लोकसभा सीट पर जीत से वहां भी आस जगी है। इसके साथ ही भाजपा की नजर उन सीटों पर है, जहां कश्मीरी पंडित वोटर हैं। पार्टी का मानना है कि कश्मीरी पंडितों ने साथ दिया तो कश्मीर में कुछ सीटें उनकी झोली में आ सकती हैं।
साथ ही केंद्र सरकार की नीतियों, बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत एवं पुनर्वास कार्यों, पाक गोलाबारी से प्रभावितों की मदद आदि कदमों का भी उसे चुनाव में लाभ मिलेगा। इन सबके बल पर मिशन 44 प्लस का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है।