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Jammu Kashmir: आस्था की राह बनी आत्मनिर्भरता की डगर, मचैल धाम से बदलने लगी पाडर घाटी की तकदीर

Mon, 31 Aug 2026 01:26 PM IST
Nikita Gupta सुधीर पाल, अमर उजाला नेटवर्क, किश्तवाड़

सार

मचैल धाम तक सड़क और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से पाडर घाटी में धार्मिक पर्यटन बढ़ा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिली है। गुलाबगढ़ से मचैल का 35 किलोमीटर का कठिन सफर अब एक दिन में पूरा होने लगा है, जिससे रोजगार और साहसिक पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।
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मचैल माता यात्रा - फोटो : संवाद
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विस्तार
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पाडर घाटी के ऊंचे पहाड़ों के बीच बसे मचैल गांव और इसके आसपास की फिजां तेजी से बदल रही है। कभी साल के आठ महीने सन्नाटे में डूबे रहने वाला यह इलाका आज धार्मिक पर्यटन के दम पर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहा है। पिछले कुछ वर्षाें में हुए विकास और मचैल माता (चंडी माता) के श्रद्धालुओं की आसान पहुंच ने यहां की तकदीर संवारी है। हालांकि, विकास की इस तस्वीर के बीच पिछले वर्ष आपदा का दंश झेलने वाला चिशोती गांव यात्रियों का ठहराव कटने की पीड़ा सह रहा है।

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‘अमर उजाला’ ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर तीर्थ यात्रा और स्थानीय अर्थव्यवस्था में आए इस बड़े बदलाव की जमीनी पड़ताल की। दो साल पहले तक गुलाबगढ़ बेस कैंप से मचैल गांव तक का 35 किलोमीटर का दुर्गम सफर केवल शारीरिक रूप से सक्षम भक्तों के ही बस की बात थी। आज सड़कों और बुनियादी ढांचे के विकास ने इस मुश्किल दूरी को समेट दिया है। स्थानीय लोगों और जम्मू-कश्मीर के दूसरे जिलों से आए श्रद्धालुओं से बात करने पर तस्वीर साफ नजर आती है कि बदलाव सिर्फ रास्तों में नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी में भी आया है। वे खुले मन से स्वीकारते हैं कि बदलाव हुआ है-तीर्थ यात्रा में और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी।

डोडा निवासी 52 वर्षीय स्वामी राज 15 वर्ष से अधिक समय से मचैल माता (चंडी माता) की यात्रा पर आ रहे हैं। इस बार भी निकले। रास्ते में मिले तो जय माता दी के साथ बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा। बोले- इतने वर्षों में हमने यात्रा मार्ग के हर पग की मिट्टी को महसूस किया है। पहले पैदल यात्रा में तीन दिन से अधिक लग जाते थे।

डोडा से प्रेम नगर, ठाठरी, शालामार, किश्तवाड़, करथई, अठोली, गुलाबगढ़, कुकंदरांव, मसूह, कुंडेर, चिशोती और फिर मचैल पहुंचते थे। जगह-जगह लंगर लगे होते थे। स्थानीय लोग हर कदम पर स्वागत के लिए खड़े मिलते थे। अब मचैल गांव तक सड़क है और गुलाबगढ़ आधार शिविर से सीधे बिना रुके मचैल पहुंचकर एक दिन में यात्रा संभव हुई है।

80 घरों के गांव में टेंट सिटी से तरक्की की ओर बढ़ रहे कदम
मचैल छोटा और सुदूर पहाड़ी गांव है। करीब 80 घर होंगे। हर घर में होम स्टे है। यात्रा में लाखों श्रद्धालु आते हैं। भारी भीड़ के आगे होमस्टे कम पड़ने लगे तो गांव के पास टेंट सिटी बसा दी गई। हम टेंट सिटी में पहुंचे तो वहां हरि किशन उर्फ राजू मिले। वे मचैल के ही हैं। उन्होंने बताया कि इस बार 300 से अधिक टेंट लगाए गए। 50 टेंट अकेले उनके हैं। सुविधाओं के आधार पर एक टेंट का किराया 300 से 2000 रुपये तक है। जम्मू, कटड़ा समेत दूसरे जिलों से भी लोगों के टेंट हैं। प्रशासन ने इस बार प्रतिदिन 6000 श्रद्धालुओं का स्लाॅट रखा। अब तक ढाई लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं।

सेवा भाव से होम स्टे तक बढ़े आजीविका के अवसर
कभी केवल मक्का और आलू की पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले स्थानीय निवासियों के लिए अब यह यात्रा आजीविका का मुख्य आधार बन चुकी है। स्वामी राज बताते हैं कि 10 साल पहले तक लोग श्रद्धालुओं की सेवा के लिए अपने घर के दरवाजे खोल देते थे। खाना-पीना और आश्रय सब सेवाभाव था। घरों के दरवाजे आज भी खुले हैं, पर स्वरूप बदल गया है। घर अब होमस्टे में बदल गए हैं। लोगों की आजीविका के साधन बढ़े हैं। विशेषकर गुलाबगढ़ और मचैल जैसे क्षेत्रों में होमस्टे व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है।

ट्रेकिंग के शाैकीनों को मिला नया डेस्टिनेशन
मचैल तक सड़क बनने से पहुंचना बेहद आसान हो गया है। इसका फायदा ये हुआ कि मुख्य यात्रा संपन्न होने के बाद भी श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी रहने की उम्मीद जगी है। इसके अलावा, एडवेंचर और ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए ये नया डेस्टिनेशन बनकर उभरा है। यहां पार्किंग में खड़ी दर्जनों बाइकें तस्दीक करती हैं कि ये गांव-क्षेत्र अब सिर्फ तीर्थाटन ही नहीं, बल्कि साहसिक पर्यटन का भी नया केंद्र बन रहा है। मचैल में 2016 में पहला बाइकर पहुंचा था।

2018 में पहली बार मचैल पहुंची बिजली : मचैल में वर्ष 2018 में पहली बार बिजली पहुंची तो स्थानीय लोगों की जिंदगी आबाद होने लगी। पिछले साल चिशोती आपदा के बाद मचैल मंदिर की दर्शनी ड्योड़ी तक सड़क बन गई। आज गांव के लोगों के पास वाहन हैं और ये उनकी कमाई का जरिया भी बने हैं।
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उधर, मचैल तक सड़क बनी तो वीरान रह गया चिशोती
सड़क बनने से मचैल तक सीधी पहुंच बनी तो पिछले साल 14 अगस्त की प्राकृतिक आपदा में तबाह हुआ चिशोती गांव अब वीरान नजर आता है। पारंपरिक पैदल यात्रा में श्रद्धालु यहां रुकते थे तो लोगों की कुछ आय हो जाती थी। अब गुलाबगढ़ आधार शिविर से श्रद्धालु वाहनों से सीधे मचैल पहुंचते हैं। बीच के करीब आधा दर्जन गांव छूट गए हैं। चिशोती में स्थानीय युवा जमैल सिंह राठोर से बातचीत शुरू की तो बात काटते हुए बोले- हमारे लिए तो कुछ नहीं बदला। आपदा में सबकुछ तबाह हो गया और वादे धरे रह गए। हमारे और हमारे गांव के लिए पारंपरिक पैदल यात्रा ही सही थी। सुझाव देते हुए कहने लगे कि हां, विकास जरूरी है, लेकिन मचैल से 7-8 किलोमीटर पहले से यात्रा पैदल ही रखी जाए ताकि रास्ते के गांवों का रोजगार बचा रहे। स्थिति यह है कि इस बार यहां सिर्फ छड़ी मुबारक ही मात्र 50 श्रद्धालुओं के साथ रुकी।
 
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